अरुणाचल में ऊँट किस करवट बैठेगा?

BY EP Hindi | PUBLISHED: 16 July 2016

मंज़र आलम, पूर्वोत्तर भारत संपादक, ईटानगर से

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देश में शायद पहली बार ऐसा हुआ है जब कोई राज्य ऐसे राजनैतिक संकट से गुज़र रहा है.

यहां दो नेता खुद को राज्य का मुख्यमंत्री होने का दावा कर रहे हैं और जनता यह समझ नहीं पा रही है कि आखिर उन का मुख्यमंत्री है कौन. अरुणाचल प्रदेश राज्य ऐसे ही संकट से गुज़र रहा है.

नाबम तुकी और कालिखो पुल दोनों खुद को मुख्य मंत्री बता रहे हैं और अरुणाचल की जनता इस असमंजस में है कि आखिर उनका मुख्य मंत्री है कौन हैं, तुकी या पुल?

लेकिन अब फैसले की घड़ी भी आ गई है. कुछ ही घंटों के बाद अरूणाचल की जनता को उनका मुख्यमंत्री मिल जाएगा.

शनिवार को नाबम तुकी को बहुमत साबित करना है. यूं तो नाबम तुकी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दिल्ली में ही यह कहते हुए मुख्यमंत्री का पद भार संभाल लिया था, कि यह उनकी और लोकतंत्र की जीत है.

लेकिन उस समय नाबम तुकी शायद यह भूल गए थे कि अभी उन्हें एक और लड़ाई में विजय प्राप्त करना बाकी है और यह है सदन में आंकड़ों की लड़ाई.

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मुख्यमंत्री नाबम तुकी के दिल्ली से ईटानगर लौटते ही राज्यपाल ने उन्हें फरमान सुना दिया की वह शनिवार तक सदन में अपना बहुमत साबित करें.

हालांकि बहुमत साबित करने के लिए नाबम तुकी ने 10 दिनों का समय माँगा जिसे राज्यपाल ने मंज़ूर नहीं किया. ऐसे में नाबम तुकी लगातार विधायकों से संपर्क बना रहे हैं.

60 सदस्यों वाली अरुणाचल विधानसभा में फिलहाल 58 सदस्य हैं. बहुमत के लिए कांग्रेस को 30 विधायकों का समर्थन चाहिए. फिलहाल उनके पास सिर्फ 15 सदस्य हैं. अब बदले हालात में बहुमत साबित करना मुख्यमंत्री नाबम तुकी के लिए लोहे के चने चबाने जैसा ही है.

उधर पूर्व मुख्यमंत्री कलिखो पुल जो कभी नाबम तुकी के मंत्रिमंडल में मंत्री हुआ करते थे, 36 विधायकों के साथ गुवाहाटी में डेरा जमाए हुए हैं और विश्वास मत का इंतजार कर रहे हैं.

कलिखो पुल का दावा है कि उनके साथ 43 विधायक हैं और नाबम तुकी किसी भी हालत में सदनमें बहुमत साबित नहीं कर पाएंगे.

बता दें कि बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने अरूणाचल प्रदेश विधानसभा सत्र को एक महीने पहले बुलाने के राज्यपाल जेपी राजखोआ के निर्णय को असंवैधानिक बताते हुए इसे खारिज कर दिया और प्रदेश में नाबम तुकी के नेतृत्व वाली बर्खास्त कांग्रेस सरकार को फिर से बहाल कर दिया था.

न्यायमूर्ति जेएस खेहर की अगुआई वाली पांच न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ ने सर्वसम्मति से अपने फैसले में कहा कि अरूणाचल विधानसभा में 15 दिसंबर, 2015 की यथास्थिति कायम रखी जाए.

अरुणाचल प्रदेश में राजनैतिक अस्थिरता का दौर उससमय शुरू हुआ था जब 9 दिसंबर को गुवाहाटी हाई कोर्ट ने राज्यपाल जेपी राजखोआ के विधानसभा के सत्र को एक महीने पहले 16 दिसंबर को ही बुलाने के फैसले को सही ठहराया था.

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इसके बाद 26 जनवरी को राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया और कांग्रेस की नाबम तुकी वाली सरकार परेशानी में आ गई क्योंकि 21 विधायक बागी हो गए. इससे कांग्रेस के पास 47 में से 26 विधायक रह गए.

सुप्रीम कोर्ट ने 18 फरवरी को दूसरी सरकार बनाने से रोकने की तुकी की याचिका नामंजूर कर दी. 19 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान ही बागी हुए कालीखो पुल ने 20 बागी विधायकों और 11 बीजेपी विधायकों के साथ मुख्यमंत्री की शपथ ले ली और सरकार बना ली थी.

लेकिन कांग्रेस हार नहीं मानी और अरुणाचल प्रदेश के स्पीकर नबम रेबिया ने सुप्रीम कोर्ट में ईटानगर हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी.

अब हार जीत का फैसला आंकड़ों पर पर आ कर रुक गया है. बीजेपी ने भी कालीखो पुल के नेतृत्व वाली बागी विधयाकों की पार्टी पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल प्रदेश (पीपीऐ) को अपना समर्थन देने की घोषणा पहले ही कर चुकी है.

अब अगर नाबम तुकी बहुमत साबित नहीं कर पाए तो उन्हें कुर्सी छोड़नी होगी. ऐसे में कलिखो पुल फिर सरकार बनाने का दावा कर सकते हैं और राज्यपाल उन्हें बहुमत साबित करने का मौका दे सकते हैं.

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