आतंक को लेकर उदार हैं उदारवादी?

BY Shivkant | PUBLISHED: 20 July 2016

 

आतंकवाद को लेकर उदारवादियों के रुख़ को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आतंकवादियों की मौत और सुरक्षाकर्मियों के शहीद होने पर उनके अलग-अलग रवैये को लेकर प्रश्न किए जा रहे हैं। सवाल यह भी है कि आख़िक उदारवादी चाहते क्या हैं और उनकी सही सच्ची विचारधारा क्या है। वरिष्ठ पत्रकार सागरिका घोष ने टाइम्स ऑफ इंडिया में अपने आलेख में इन्हीं सवालों की पड़ताल करने की कोशिश की है।

इसमें सागरिका ने लिखा है पाकिस्तान हो या भारत, उदारवादियों का संकट एक जैसा ही है। उन्होंने पाकिस्तान के वयोवृद्ध नागरिक अधिकार कार्यकर्ता परवेज़ हूदभोय के हवाले से लिखा है,’पाकिस्तान में उदारवादी अब विलुप्तप्राय जीव हो गए है… उदारवादियों की जीत विरली ही देखने को मिलती है। दरअसल उदारवादी व सार्वभौम सोच वाला होने से कहीं आसान कट्टरपंथी व राष्ट्रवादी हो जाना है।’ सागरिका कहती हैं कि उक्त वक्तव्य में ‘पाकिस्तान’ की जगह भारत को रख दें तो वह भारतीय उदारवादियों की स्थिति को भलीभाँति व्यक्त कर देगा।

दुनिया पर इस्लामी आतंकवाद की बार-बार मार ने लगता है कि उदारवादियों के पैरों के नीचे से ज़मीन छीन ली है। जब बार-बार निर्दोषों का कत्लेआम हो रहा हो तो घृणा की भाषा को टालने, विधि न्याय कायम रखने या धार्मिक पूर्वाग्रह टालने की बात करना भी मुश्किल हेा जाता है। ऐसे आतंकवाद के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की बात नहीं करने वाले उदारवादी को ‘मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाला’, ‘आतंकवाद का समर्थक’ या ‘देशद्रोही’ का तमगा बड़ी आसान से दे दिया जाता है। जैसे कि बुरहान वानी की मुठभेड़ में मौत पर सवाल उठाने वाले को भारत-विरोधी के रूप में देखा जाता है।

वे कहती हैं कि इस दौर की बहसों में राष्ट्रवादी बड़ी ठसक से जीत रहे हैं और उदारवादी बुरी तरह हार रहे हैं। लेकिन सागरिका कहती हैं कि यह कहना बहुत ग़लत होगा कि आतंकवाद को लेकर उदारवादियों का रवैया बहुत नरम है। बल्कि उदारवादी तो आतंकवाद के साथ साथ घृणा दोनों को लेकर अस्वीकार्यता यानी बिलकुल सहन नहीं करने वाला है। सागरिका ने इस संबंध में पाकिस्तान में उदारवादी नेता सलमान तासिर की हत्या और बांग्लादेश में कट्टरपंथियों से खुलकर टक्कर ले रहे उदारवादियों की मौत का जिक्र किया है इनकी तुलना भारत में दाभोलकर, पनसारे व कलबुर्गी से की है जो कि ‘धर्मांध हत्यारों’ के हाथों मारे गए।

सागरिका घोष का पूरा आलेख यहाँ पढ़ें।

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Source - सागरिका घोष, टाइम्स ऑफ़ इंडिया