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BY EP Hindi | PUBLISHED: 20 July 2016

 

समाचारों की दुनिया बदल रही है। समाचार संकलन और प्रस्तुतीकरण ही नहीं, समाचार देने और उपलब्ध कराने के तौर तरीकों में भी आमूल-चूल बदलाव आया है। मिंट अखबार में राहुल मथान ने इस बारे में एक आलेख लिखते हुए घोषणा की है कि समाचारों का आधुनिक चेहरा सोशल मीडिया है और क्या हम इसे पत्रकारिता कहने या जर्नलिज्म के रूप में स्वीकार करने को तैयार हैं?

राहुल ने लिखा है कि हाल ही में उन्हें ज्यादातर बड़ी खबरों की जानकारी विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफार्म के जरिए मिली। चाहे वह श्वेत पुलिसकर्मियों के हाथों अश्वेत एल्टन स्टर्लिंग की मौत हो या अंतिम सांस लेता फिलांडो केस्टाइल। नीस पर आतंकी हमले हों या तुर्की में तख्तापलट की कोशिश। उन्हें इन सभी समाचारों के बारे में पहले पहल जानकारी फेसबुक, ट्वीटर व अन्य सोशल मीडिया मंचों के ज़रिए मिली।

वे कहते हैं कि स्मार्टफोन के बढ़ते प्रचलन व हाइस्पीड तथा सस्ते इंटरनेट की उपलब्धता ने आम आदमी के संवाद-संचार का तरीका ही नहीं बदला इसने समाचार जगत को ही बदल दिया है। इंटरनेट की सुविधा वाले स्मार्टफोन रखने वाला कोई भी व्यक्ति चलती फिरती मानवीय ‘ओबी वैन’ बन गया है। सूचनाओं के परंपरागत गढ़ ढह रहे हैं। यही कारण है कि आज न्यूयॉर्क टाइम्स के ऑनलाइन ग्राहकों की संख्या प्रिंट वाले ग्राहकों से अधिक है। भारत में भले ही अभी प्रिंट मीडिया अच्छी खासी दर के साथ बढ़ रहा हो लेकिन स्क्रॉल व द वायर जैसी पहलों की सफलता भविष्य के संकेत दे रही है।

हालांकि वे इस तरह की नागरिकता पत्रकारिता के दूसरे व हानिकारक पहलुओं का भी ज़िक्र करते हैं। वे कहते हैं कि मीडिया की इस नयी विधा के लिए कोई ढाँचा या रूपरेखा बनाए जाने की ज़रूरत है जो कि इसे और अधिक सक्षम बनाए।

राहुल मथान का पूरा आलेख यहाँ पढ़ें।

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Source - राहुल मथान, लाइव मिंट