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कमजोर पड़ रही है कांग्रेस की जजमानी व्यवस्था

BY Nalin | PUBLISHED: 3 September 2016

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समाचार पाक्षिक ओपन ने अपने ताजा अंक में  कांग्रेस की मौजूदा उत्साहीन स्थिति को – जब लगातार लग रहे चुनावी झटकों के बीच आम कार्यकर्ता बिना कोई सवाल किए शीर्ष नेतृत्व के प्रति आस्थावान बने हुए हैं – पार्टी को विरासत में मिली जजमानी व्यवस्था से जोड़ा है.

पत्रिका के प्रबंध संपादक पीआर रमेश ने अपने आलेख में याद दिलाया है कि जजमानी व्यवस्था में छोटे काम करने वालों तथा शिल्पी-कारीगरों को समाज के बाकी लोग पहले से तयशुदा काम करने लिए थोड़ी-सी सहायता देते थे – उद्देश्य होता था तात्कालीन सामाजिक ताने-बाने को बनाए रखना. सहायता पाने वाले वर्ग में आधिपत्य वालों की प्रति मातहती का स्थाई भाव घर कर जाता था. आजादी से पहले की कांग्रेस में वशीभूतता की जजमानी व्यवस्था वक्त की मांग थी, और तब के सुप्रीम लीडर गांधीजी ने  न्यूनतम सामाजिक बदलाव और कार्यकर्ताओं में मतभेदों को नहीं पनपने देने के उद्देश्य से आधिपत्य की इस व्यवस्था को अपनाया था ताकि सारा जोर एकजुट होकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष करने पर रहे.

शुरुआती दिनों में बड़ी संख्या में कांग्रेसी शिक्षित वर्ग – वकील, शिक्षक, पत्रकार, जमींदार – से आते थे. वे दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और फिरोजशाह मेहता जैसे कद्दावर नेताओं की बातों का अनुपालन करते थे. ऊपर से नीचे शक्ति का हस्तांतरण एक सर्वमान्य व्यवस्था थी. हर प्रांत के अपने-अपने बड़े नेता थे, जैसे- संयुक्त प्रांत में मोतीलाल नेहरू, मदनमोहन मालवीय और पुरुषोत्तम दास टंडन, आंध्र क्षेत्र में सीतारमैय्या, गुजरात में सरदार वल्लभ भाई पटेल आदि. आदेश पर काम करना ही नियम था, नकि आमसहमति के लिए प्रयास करना.

गांधी के बाद आधिपत्य वाली स्थिति में स्वाभाविक रूप से जवाहरलाल नेहरू आए. उन्हें चुनौती देने की स्थिति में एकमात्र नेता पटेल थे, जिन्होंने 1948 के जयपुर के पार्टी सम्मेलन में ऐसा किया भी लेकिन उन्हें पता था कि वोट दिलाने वाला एकमात्र नेता नेहरु हैं इसलिए वे ‘दुधारु गाय की लात सहने’ के लिए तैयार हो गए. बाकी नेता तो पहले से ही पुरानी व्यवस्था को मानते हुए नेहरु के कहे पर चलने लगे थे. लेकिन ‘हाई कमान’ की इस व्यवस्था को सख्ती से लागू करने का काम सबसे पहले इंदिरा गांधी ने किया. अपने खिलाफ आवाजें उठने पर उन्होंने 1969 में पार्टी में विभाजन तक करा डाला. और उसके बाद तो वह और ज्यादा आधिपत्यवादी हो गईं.

कांग्रेस हाईकमान की यह सामंती प्रकृति की सत्ता उस दौर में भी उभरकर सामने आई जब सोनिया गांधी ने नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी के सात वर्षों के नेतृत्व के बाद पार्टी प्रमुख का पद ग्रहण किया. अधिकांश कांग्रेसियों ने उन्हें नेहरु-गांधी परंपरा के सच्चे वारिस के रूप में स्वीकार कर लिया. अब राहुल गांधी को लेकर पहले से ही भूमिका बनाई जा रही है कि यदि वे पार्टी का नेतृत्व संभालते हैं तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी. लेकिन अनेक कांग्रेसी ऐसे परिदृश्य की कल्पना कर चिंतित हैं. क्योंकि जिन पिछले कुछ चुनावों में कांग्रेस के अभियान की कमान राहुल ने संभाली उनमें पार्टी की बुरी गत रही है. 2014 के लोकसभा चुनाव में तो पार्टी 44 के आंकड़े पर सिमट कर रह गई.

पीआर रमेश लिखते हैं कि हालांकि कांग्रेस की जजमानी व्यवस्था में बीते काल में काफी बदलाव आ चुके हैं लेकिन यह अब जिस दिशा में जा रही है उससे आम कांग्रेसियों को कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए. भावी नेता राहुल गांधी पिछले वर्षों में कई बार साबित कर चुके हैं कि वे राजनीति की वास्तविकताओं से अनजान हैं. पार्टी में नई जान डालने के लिए ठोस योजनाएं बनाने की जगह उनकी हाल के वर्षों की उपलब्धि है- प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ नए-नए जुमले उछालना. महत्व के विषयों पर आज पार्टी की कोई सुसंगत या स्पष्ट लाईन नहीं होती है.

अपने लंबे आलेख के अंत में पीआर रमेश का कहना है कि कांग्रेस हाईकमान के आदेशों के प्रति वो पुराने जमाने वाली अटूट श्रद्धा भी नहीं रही है. सोनिया गांधी के अक्सर अस्वस्थ रहने के इस दौर में कई क्षेत्रीय कांग्रेसी नेता केंद्रीय नेतृत्व की अनसुनी करने की हिमाकत भी कर रहे हैं. उदाहरण के लिए दिल्ली में हाईकमान द्वारा आगे बढ़ाए गए अजय माकन को बाकी नेताओं का पूर्ण समर्थन अभी तक नसीब नहीं हुआ है. लेकिन कांग्रेस की जजमानी व्यवस्था शायद अभी पूरी तरह नहीं बिखरे क्योंकि पार्टी एक असरहीन जजमान की अगुवाई में बुरी गत के लिए तैयार बैठी दिखती है.

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3 September 2016