ताजा समाचार

भाजपा की भूल, दलित देवी की वापसी, भक्त-जनों के साथ

mayawatibigimage1024x662

बीजेपी नेतृत्व ने दयाशंकर सिंह के खिलाफ कार्यवाही करने में कतई कोताही नहीं बरती. फ़ौरन पार्टी से निलंबित किया. मायावती के सन्दर्भ में जो सिंह ने शर्मनाक, मूर्खतापूर्ण और राजनितिक दृष्टि से आत्मघाती टिप्पणी की थी उसकी तुरंत भर्त्स्ना की. यहाँ तक माफ़ी भी मांग ली. लेकिन तब पछताए क्या होता है जब चिड़िया चुग गयी खेत! कहते हैं न घोड़े के भाग जाने के बाद अस्तबल बंद करने का क्या लाभ, इस प्रकरण में घोडा नहीं हाथी ही भाग छूटा है. और अब बसपा का हाथी चिंघाड़ रहा है, संसद के भीतर, बाहर सडकों पर, दिल्ली से लेकर लखनऊ तक.

बसपा का हाथी एक बार फिर मदमस्त अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहा है. उधर दया शंकर सिंह फरार है. उनका फ़ोन बंद है. लखनऊ में पत्नी एंव बिटिया के बारे में बसपा कार्यकर्ता वैसी ही असभ्य और शर्मनाक भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं जिस तरह की भाषा के प्रयोग का खामियाज़ा दया शंकर भुगत रहे हैं. बीजेपी दलित और ठाकुर पाटों के बीच फँसी नज़र आ रही है पर जिस राज्य में २१ प्रतिशत वोटर दलित हों वहां फिलहाल तो कोई ठाकुरों की सुध लेने वाला नहीं है.

मायावती ने स्वंय को देवी घोषित कर दिया है. इस मुद्दे पर लौटते हैं कुछ देर में लेकिन इस बात में कोई शक नहीं की भगवान इस समय बसपा सुप्रीमो के साथ दिख रहे हैं. मायावती पर यह अशोभनीय हमला उस दौर में हुआ है जब उनके राजनितिक तारे कुछ गर्दिश में नज़र आ रहे थे. पार्टी के वरिष्ट नेता उनको छोड़ जा रहे थे, उत्तर प्रदेश का ज़मीनी माहौल कुछ बहुत ज़्यादा अनुकूल नज़र नहीं आ रहा था. कई प्रेक्षकों को लग रहा था की बसपा की मुहीम सुस्त पड़ रही है और बहनजी के करिश्माई व्यक्तित्व का चमत्कार भी कुछ मद्धम पड़ रहा है.

ऐसे में दया शंकर की टिपण्णी ने बसपा में नई जान फूंक दी और बहनजी को मौका दिया अपने समर्थको और वोटबैंक को वापस संगठित करने का, अपनी छतरी तले एकत्रित करने का. मौका ताड़ मायावती ने फ़ौरन स्वंय को अपने समर्थकों और दलितों की देवी घोषित कर दिया. अगर बहनजी किसी और वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहीं होती, किसी ऊँची जात से होती तो शायद वह ऐसा करने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी. इतनी आलोचना होती, खिल्ली उड़ती, उन्हें कोई मैग्लोमेनिया से ग्रस्त बताता तो कोई डिक्टेटर करार देता. अलोकतांत्रिक और तानाशाह तो उन्हें अभी भी कहते ही हैं तब बात में और दम आ जाता. पर मायावती पर टीका टिप्पणियों के यह कानून लागू नहीं होते. उनके समर्थकों के लिए वो किसी देवी या ईश्वर का ही स्वरूप हैं.

कारण भी उसका स्पष्ट है. दलितों का सैकड़ों सालों से शोषण हुआ है. बहुत दबी कुचली अत्याचार सहती ज़िन्दगी उनके पूर्वजो ने गुज़ारी है. स्तिथियाँ आज भी कई जगह बहुत शोचनीय हैं. ऐसे में मायावती का शहंशाही और राजसी रवैया, उनका मंच पर अकेले सिंहासन ग्रहण करना, अपने साथियों को भी अपने से बहुत नीचे स्थान देना, महंगे चमकदार रत्न और आभूषण पहनना, कई मंज़िल ऊँचा और क्विंटलों का केक काटना, इन सभी बातों से उनके दलित जनाधार में एक ऐसे संतोष और विश्वास का भाव उत्पन्न होता है जिसे शायद सवर्ण जाती के लोगों के लिए समझना आसान नहीं है.

मायावती जब सबको रौंदते हुए आगे बढ़ती हैं, अपने विरोधियों को नेस्तनाबूद करती हैं, नीचा दिखती हैं तो अपने समर्थकों को सदियों का हिसाब बराबर करने का एहसास दिलाती हैं. मायावती दलितों के लिए सिर्फ सशक्तिकरण की ही प्रतीक नहीं हैं, बराबरी और समय के साथ दूसरो से आगे निकलने और उन पर राज करने के भाव की भी अभिव्यक्ति हैं.

इसलिए ही मायावती देवी हैं. अपने भक्तों की नज़र में. यह बीजेपी का दुर्भाग्य है कि प्रधानमंत्री मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह जो एक-एक पत्थर रख दलितों के किले में सेंघ लगाने की योजना बना रहे थे वह फिलहाल तो दया शंकर की मूर्खता की वजह से खटाई में पड़ गई है.

देवी उत्तर-प्रदेश की राजनीती का एक बार फिर केंद्रबिंदु बन गई हैं. उनकी वापसी हो गई है. अपने भक्तजनो के साथ.

Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और ट्विटरपर फॉलो करे! हर पल अपडेट रहने के लिए डाउनलोड करें Hindi News App

Source - hindi.editplatter.com