ताजा समाचार

बच गई कांग्रेस सरकार, पर घटनाक्रम से सीख की ज़रुरत

BY Nalin | PUBLISHED: 17 July 2016

मंज़र आलम, पूर्वोत्तर संपादक, ईटानगर

अरुणाचल प्रदेश में मुख्य मंत्री का चेहरा बदल कर एक ओर जहां कांग्रेस अपनी सरकार बचाने में सफल हुई है वहीं बीजेपी को करारा झटका भी मिला है. केवल चार दिन पहले गुवाहाटी में आयोजित बीजेपी नेतृत्व वाली नॉर्थ ईस्‍ट डेमोक्रेटिक एलायंस ( NEDA ) के पहले सम्मलेन में जब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पूर्वोत्तर को कांग्रेस मुक्त करने की हुंकार भर रहे थे, उसी समय सत्ता से बेदखल हो चुकी कांग्रेस सरकार उस कोर्ट के आदेश पर फिर से अरुणाचल में बहाल कर दी गयी.

pema

तुकी की जगह पेमा खांडू

कांग्रेस के 30 बागी विधायकों ने तीन मार्च 2016 को पीपुल्‍स पार्टी ऑफ अरुणाचल (पीपीए) बना ली थी. वे कालिखो पुल की अगुवाई में NEDA के सम्मेलन में भी शामिल हुए थे. सम्मलेन में मौजूद कालीखो पुल ने भी अमित शाह के सुर में सुर मिलाया था.

लेकिन इस बार कांग्रेस ने ऐसी चाल चली के सभी चारों खाने चित हो गए यहाँ तक की बागी विधायक भी कांग्रेस में वापस आ गए. कांग्रेस ने किसी माहिर शतरंज के खिलाड़ी की तरह ऐसी चाल चली जिस के बारे में न तो कालीखो पुल और न ही बीजेपी ने सोचा था. कालीखो पुल अपने विधयाकों के साथ गुवाहाटी में दावा कर रहे थे कि यह आंकड़ों का खेल है, तुकी कभी सरकार नहीं बना सकते. पुल बेफिक्र थे क्योंकि बीजेपी की सरपरस्ती उन्हें हासिल थी. लेकिन कांग्रेस ने अपनी चाल से बागी नेता कालीखो को यह बता दिया की खेल आंकड़ों को तो ज़रूर होता है लेकिन कैसे खेला जाता है इस में कालीखो अभी कमज़ोर हैं.

इस घटनाक्रम में नाबम तुकी हार कर भी जीत गए. क्योंकि उन्हों ने अपने बागी साथी कालीखो पुल का भी सपना पूरा नहीं होने दिया. कालीखो पुल को अपने साथ लेकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाने वाली बीजेपी का भी सपना टूट गया और वह राज्य की सत्ता के करीब आ कर भी सत्ता हासिल नहीं कर सकी.

लेकिन अरुणाचल प्रदेश के इस पूरे राजनैतिक घटनाक्रम से कांग्रेस पार्टी और उस के बड़े नेताओं को भी सीख लेने की ज़रुरत है. क्योंकि  हर बार शायद सुप्रीम कोर्ट का सहारा उन्हें न भी मिले.

साल भर पहले हुई थी शुरुआत

amit-shah1-620x400

अमित शाह की रणनीति नाकाम रही अरुणाचल में

अरुणाचल में राजनैतिक हलचल साल भर पहले शुरू हुई थी जब विधायकों का एक दल नाबम तुकी के कार्यशैली के प्रति असंतुष्टि जाहिर की. उन्होंने अपनी शिकायतें कांग्रेस आलाकमान तक पहुंचाने का बहुत प्रयास किया लेकिन किसी ने उन पर ध्यान नहीं दिया. फिर 25 अक्टूबर 2015 को सबसे पहले पेमा खांडू ने जो उस समय पर्यटन मंत्री थे, तुकी मंत्री मंडल से इस्तीफा दे दिया. उस के बाद कई और मंत्रियों ने इस्तीफा दिया. फिर तुकी से नाराज़ विधायकों का एक दल कई सप्ताह तक दिल्ली में डेरा डाले रहा और पार्टी आलाकमान से मिल कर उन्हें अपनी शिकायतें बताने का प्रयास करता रहा. लेकिन कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने उन की एक न सुनी और वे वापस अरुणाचल लौट आए. उसके बाद शुरू हुआ बगावत का दौर. लोहा गर्म देख कर बीजेपी ने भी अपना वार कर दिया और बागी विधायकों को बाहर से सपोर्ट दे कर नाबम तुकी को सत्ता से बेदखल कर दिया.

कांग्रेस पार्टी ने शनिवार को अरुणाचल में विधायक दल के नेता को बदलने का जो फैसला लिया यदि यह 10 महीने पहले बागी विधायकों की शिकायत सुनकर ले लिया जाता तो शायद न ही अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगता और न ही राजनैतिक अस्थिरता पैदा होती. भले ही आज राज्य में कांग्रेस की सरकार बच गयी है, लेकिन इन परिस्थितियों के लिए ज़िम्मेदार कहीं न कहीं कांग्रेस के वह वरिष्ठ नेता भी हैं जिन्हें आलाकमान द्वारा राज्य की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी है.

Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और ट्विटरपर फॉलो करे! हर पल अपडेट रहने के लिए डाउनलोड करें Hindi News App