क्या POK चुनावों के वक़्त वादी में हिंसा भड़कना महज संयोग है?

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कश्मीर घाटी में इसी महीने हुए प्रदर्शनों व हिंसा का क्या पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर: पीओके: से कोई संबंध था। यह महज संयोग नहीं है कि कश्मीर घाटी में हिंसा उसी समय भड़की जबकि पीओके में चुनाव प्रक्रिया चल रही थी और वहां की राजनीतिक दलों ने इस मुददे को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इंस्टीट्यूट फोर डिफेंस स्टडी एंड एनालसिस की वरिष्ठ फेलो प्रभा राव ने इस मुददे को अपने एक ताजा आलेख में उठाया है जो कि आईडीएसए की वेबसाइट पर प्रकाशित हुआ है।

इसमें उन्होंने लिखा है कि आतंकवादी बुरहान वानी की मौत 8 जुलाई को हुई, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में चुनावों से ठीक पहले। बस फिर क्या था पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में चुनाव लड़ रहे लगभग सभी राजनीतिक दलों को एक बड़ा व जोरदार मुददा मिल गया। भले ही वह सत्तारूढ पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज :पीएमएनएन: हो, विपक्षी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी :पीपीपी:, पाकिस्तान तहरीके इंसाफ :पीटीआई:, या अन्य राजनीतिक दल। इन सभी दलों ने ‘शहीद’ बुरहान वानी के गुण बांचते हुए जम्मू कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन और कथित भारतीय अत्याचार के खिलाफ अपना रटा रटाया आलाप छेड़ दिया।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ 15 जुलाई को मंत्रिमंडल की बैठक करते हैं और कश्मीरियों की ‘स्वतंत्रता की लड़ाई’ को पाकिस्तान के पूरे समर्थन की घोषणा करते हैं। वे बुरहानी वानी की मौत के खिलाफ 19 जुलाई को ‘काला दिवस’ मनाने की घोषणा करते हैं हालांकि इस तारीख को बाद में 21 जुलाई कर दिया जाता है जिस दिन पीओके में चुनाव होने होते हैं। नवाज शरीफ इस्लामाबाद में चुनाव प्रचार के दौरान दोहराते हैं कि पाकिस्तान कश्मीर में भागीदार बना रहेगा इसे भारत का आंतरिक मसला नहीं माना जा सकता। पाकिस्तान के विदेश सचिव एजाज अहमद चौधरी भी नवाज शरीफ के सुर में सुर मिलाते हुए नजर आते हैं।

प्रभा राव ने लिखा है कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में चुनाव प्रक्रिया के दौरान नवाज शरीफ, उनकी सरकार व पार्टी, कश्मीर के कथित मुददे को पूरी हवा देने की कोशिश करत है। चुनाव परिणाम जब आते हैं तो पीओके में पीएमएलएन 41 में से 31 सीटें जीत जाती है।

नवाज शरीफ 22 जुलाई को मुजफ्फराबाद में विजय रैली में भाषण देते हुए कहते हैं,’हमें उस दिन का इंतजार है जब कश्मीर पाकिस्तान में मिल जाएगा।’

अपने आलेख में प्रभा राव पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में चुनावों के दौरान के घटनाक्रमों का ब्यौरा दिया है और यह बताने की कोशिश की है कि नवाज शरीफ ने किस तरह इस मुददे व मौके का इस्तेमाल अपनी कमजोर पड़ती छवि व पकड़ को मजबूत बनाने के लिए किया।

प्रभा राव ने इस मुददे पर भारत के कुछ राष्ट्रीय टीवी चैनलों और समाचार पत्र पत्रिकाओं में बहस का जिक्र करते हुए कहा है कि यह बहस सुरक्षा बलों के स्तर पर कमियों, पैलेट गन के इस्तेमाल पर सवाल, सैन्य बलों के हद से ज्यादा इस्तेमाल व कशमीर में कथित मानवाधिकार उल्लंघन पर केंद्रित रही है। लेकिन कश्मीर घायल बच्चों की तस्वीरों को केवल ‘खाकी’ के खिलाफ रखकर ही नहीं देखना चाहिए बल्कि पाकिस्तान की निहित्त स्वार्थों वाली गड़बड़ियों के लिहाज से भी देखा जाना चाहिए।

वे लिखती हैं कि पाक के कब्जे वाले कश्मीर यानी पीओके में ‘आजादी’ एक कपोल कल्पना है इस इलाके पर मिला जुला नियंत्रण एलईटी व हिज्बुल मुजाइदीन जैसे आतंकी संगठनों तथा इस्लामाबाद में बैठे राजनीतिक एलिट वर्ग का है। यह अलग बात है कि कश्मीर घाटी में यह बात फैलाई जा रही है कि भारत की तुलना में पाकिस्तान अधिक बेहतर विकल्प है। सार इतना सा है कि इस सारे मिथ्या व झूठे प्रोपगेंडे की मार, एक आम कश्मीरी पर पड़ रही है।

प्रभा राव का पूरा आलेख यहां पढ़ें।

 

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Source - प्रभा राव, इंस्टीट्यूट ऑफ़ डिफ़ेंस स्टडीज़ एंड एनेलिसिस