‘टीवी चैनलों को न बनने दें राष्ट्रहित के ठेकेदार’ – शाह फ़ैसल

BY Shivkant | PUBLISHED: 19 July 2016

 

आईएएस अधिकारी शाह फैसल ने कश्मीर के मौजूदा हालात को लेकर एक बार फिर देश के प्रमुख टीवी चैनलों पर निशाना साधा है और राष्ट्रहित की ठेकेदारी उन्हें नहीं देने की बात की है। फैसल ने कश्मीर के मौजूदा हालात के लिए एक तरह से इन चैनलों को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा है कि वे अपनी टीआरपी के लिए कश्मीरी युवाओं की लाशों पर खेल रहे हैं और यह उनकी आदत है।

फैसल ने इंडियन एक्सप्रेस में छपे एक आलेख में यह बात कही है। इसमें उन्होंने लिखा है कि कश्मीर का असली मुददा टीवी चैनलों के स्टूडियों की बहस और सड़क पर आंदोलनरत युवाओं के बीच कहीं खो गया है। इसके साथ ही उन्होंने खुद को कश्मीरियों युवाओं का आदर्श होने से इनकार करते हुए कहा है कि 50 रुपए के मासिक वेतन और 50 लाख रुपए के होमलोन के साथ कोई कैसे किसी का आदर्श हो सकता है। वे कहीं से भी सबसे सफल कश्मीरी युवा नहीं हैं। वह भी ऐसे समय में जब लोगों की महानता को तो इससे आँका जाता है कि उसके जनाज़े में कितने ज्यादा लोग शामिल हुए।

उल्लेखनीय है कि शाह फैसल ने आईएएस  परीक्षा में टॉप किया था और यह उपलब्धि हासिल करने वाले वे पहले कश्मीरी हैं। शाह फैसल ने पिछले दिनों अपनी तुलना कश्मीर के मारे गए आतंकवादी कमांडर बुरहान वानी से किए जाने के लिए भारतीय मीडिया विशेषकर टीवी चैनलों की आलोचना की थी। दरअसल मीडिया ने उनकी तस्वीर, मारे गए बुरहान वानी के साथ लगाकर तुलना की थी कि एक तरफ तो आईएएस अधिकारी जबकि दूसरी ओर आतंकवादी, कश्मीरियों का आदर्श कौन है?

फैसल ने लिखा है कि बीते कुछ वर्षों में राष्ट्रीय मीडिया का एक वर्ग कश्मीर में ‘भारत के विचार’ को ही गलत ढंग से पेश कर रहा है। इसकी वजह इसके अपने कारोबारी हित हैं। यही नहीं, मीडिया का यह तबका बाकी देश को भी कश्मीर के बारे में गलत सलत सूचनाएँ दे रहा है। ऐसा 2008 में हुआ, 2010 में हुआ और 2014 में भी हुआ। इसलिए इस बहस के समय व झुकाव को लेकर कोई हैरानी नहीं है।

उन्होंने लिखा है कि कश्मीर पर इस समय लगभग सारे ही कार्यक्रम लोगों को उकसाने को लक्षित हैं। कवरेज चुनिंदा है और ऐसा लगता है कि यह राज्य सरकार के लिए समस्या जटिल करने के लिए किया जा रहा है। हालांकि प्रिंट मीडिया का रुख इस मामले में हमेशा ही संतुलित रहा है।

फैसल ने लिखा है कि कुछ न्यूज चैनलों की मौजूदा कारोबारी बर्बरता के दौर इस लिहाज़ से और दुखद हैं कि वे झूठ को बढावा देने, लोगों को बाँटने तथा लोकतंत्र व धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों की पूरी तरह अनदेखी करने में लगे हैं। यह ऐसे समय हो रहा है जबकि लोग मर रहे हैं और सरकार लोगों को शांत करने की भरसक कोशिश कर रही है। टीआरपी की लड़ाई को राष्ट्रीय हित का शाब्दिक जामा पहनाने व युवाओं की लाशों पर कारोबार करने की इन चैनलों की बेशर्मी, चमकते समाचारों का सबसे ख़राब पहलू है।

कश्मीर हो या कुछ ओर, भारत के लिए इस समय सबसे बड़ी चुनौती ‘देशहित’ की ठेकेदारी अपने राष्ट्रीय मीडिया से छीनना है तथा अपने पड़ोसियों व लोगों से संवाद कायम करना है।

इंडियन एक्सप्रेस में शाह फैसल का पूरा आलेख यहां पढ़ें।

शाह फैसल को एडिटप्लेटर के संपादक संजीव श्रीवास्तव का खुला पत्र यहां पढ़ें।

‘आप भले न बनें भारत के चौधरी, पर उन्हें कश्मीर का न बनने दें।’

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