ताजा समाचार

भारतीय प्राइम टाइम न्यूज में आवश्यकता संघर्षविराम की!

Arnab-Barkha--1024x400

भारतीय टेलीविजन न्यूज के दो सबसे बड़े सितारे – बरखा दत्त और अर्णब गोस्वामी– सरेआम आमने सामने हैं। एक दूसरे को देशद्रोही कह रहे हैं, चमचा कह रहे हैं. और यहां तक कह रहे हैं कि दूसरे के पत्रकार होने की वजह से उन्हें खुद को पत्रकार कहने में शर्म महसूस हो रही है। कुल मिलाकर शर्म लिहाज के सभी बंधन तोड़ टेलीविजन न्यूज के दो दिग्गज खुलकर तांडव की मुद्रा में हैं।

अच्छा नहीं लग रहा है यह सब!

लेकिन ऐसा होगा इसके संकेत तो एक लंबे समय से साफ दिख रहे थे। मुझे भी और अंग्रेजी प्राइम टाइम देखने वाले सभी दर्शकों को भी। कभी एक दूसरे का नाम लेकर, लेकिन ज्यादातर बिना नाम लिए एक दूसरे पर ये दोनों निशाना साध रहे थे। कभी पत्रकारिता के अंदाज और अदा की खिल्ली उड़ाते तो कभी एक दूसरे को किसी विशिष्ट राजनीतिक विचारधारा से जुड़े होने की बात कह,इशारों में आलोचना होती। लेकिन ये इशारे और संकेत इतने स्पष्ट होते थे कि कुछ और कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती थी।

 

barkha-screenshot

 

उधर अंग्रेजी बोलने समझने वाले वर्ग के लिए प्राइम टाइम न्यूज जैसे एक लत बन गया था. एक ऐसी कॉकटेल जिसमें पीड़ा और सुख, आनंद और वेदना, जैसे बराबर मात्रा में थी।

नतीजन समाचार और विशलेषण का महत्व घट गया। डिस्क्शन प्रोग्राम और डिबेट्स का भी कुछ यही हश्र हुआ। स्टार एंकर योद्धा बन गए और ये सब देखने वाले रोम के एरीना में मौजूद दर्शकों की तरह व्यवहार करने लगे। प्राइम टाइम से लोग जुड़ते थे अपनी खुंदक और कुंठा दूर करने के लिए। अपेक्षा उनकी होने लगी कि हर शाम टीवी स्क्रीन पर कोई न कोई बातों के संग्राम में लहुलुहान नजर आए और रोजाना उन्हें अपनी एड्रेनलिन की खुराक मिले।
इन सबके बीच निश्पक्ष समाचार और सुलझे हुए इमानदार विशलेषण की बात जैसे नक्कारखाने में तूती बनकर रह गई। न्यूज चैनल व प्राइम टाइम एंकर्स अब सूत्रधार या माडरेटर की भूमिका नहीं निभा रहे थे। वे तो स्वयं लड़ाई का हिस्सा थे।

ये टकराव और जुबानी जंग एक दिन विस्फोट का रूप लेगी ये तो साफ दिख रहा था। लेकिन उस विस्फोट में इतनी कड़वाहट, तीखापन और तीर सी तेजी होगी, इसकी अपेक्षा कम से कम मैं तो नहीं कर रहा था। मैं सोचता था कि लिहाज का आवरण इस छद्मयुद्ध में हमेशा बना रहेगा और कोई न कोई लक्ष्मणरेखा इन्हें जरूर बांधे रखेगी। पर ऐसा हुआ नहीं।

लेकिन पहले इस किस्स की पृष्ठभूमि को देखते हैं.

इस दौर की शुरुआत हुई यूपीए2 से। टाइम्स नाउ मुंबई आतंकी हमले 26/11 की कवरेज की सफलता पर सवार रेटिंग चार्ट में ऊपर की ओर अग्रसर था। और तभी राडिया टेप्स सामने आते हैं. जिनकी वजह से बरखा दत्त की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं। बरखा के लिए वह एक कठिन दौर था। वह जितना विवाद से बाहर निकलने का प्रयास करती, उतना ही उसमें उलझती जाती. बरखा में एक जीवटता है। पर राडिया टेप्स के मुद्दे पर उसने जिस तरह स्वयं अपना बचाव किया उसकी वजह से शायद मामला और उलझा। जहां तक नियम, कायदे कानून, तर्क इत्यादि का संबंध है तो बरखा का स्टैंड और उनकी पोजिशिन शायद बिलकुल सही थी। पर माहौल कुछ ऐसा था कि पब्लिक परसेप्शन में वह पूरी तरह से जैसे बरी नहीं हो पाईं। और पब्लिक के सोच का कोई तोड़ है नहीं। इसलिए अभी तक, इतने साल गुजर जाने के बाद भी राडिया टैप्स की छाया से बरखा पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाई हैं।

दूसरे पत्रकारों के बारे में बात कर रहे हैं तो उचित होगा कि मैं अपने बारे में भी कुछ कहता चलूं। अपने 33 साल के पत्रकारीय जीवन में ज्यादातर समय रिपोर्टर और संपादक रहा हूं। मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि यदि मेरा फोन टैप किया जाता तो उसमें राजनीतिक जगत के मेरे मित्रों से मेरी बातचीत के ब्यौरे भी सामने आ सकते थे और उनकी सही पृष्ठभूमि को जाने बिना उनका गलत अर्थ भी निकाला जा सकता था। वैसे राडिया टैप्स में एक ऐसा वार्तालाप भी है जिसमें नीरा राडिया मेरी आलोचना यह कहते हुए कर रही है कि मैं “लाउड माउथ एंड शोआफ” हूं।

खैर, लौटते हैं हमारे आज के प्रसंग की तरफ।

तो जिस दौर में बरखा दत्त का सितारा कुछ गर्दिश में था, अर्णब गोस्वामी भारत के मध्यम वर्ग के सामूहिक अवचेतन में एक ऐसे योद्धा के रूप में उभर रहा था जो यूपीए2 में भ्रष्टाचार से जुड़े मुद्दों को जोर शोर से उठाता था। यूपीए 2 में ऐसा कोई नहीं था जिसको अर्णब बख्शता था। जनता का भी कुछ ऐसा ही मिजाज था। लिहाजा जिस तरह 1970 के दशक में सलीम जावेद ने अमिताभ बच्चन को- जनता के तत्कालीन मूड का सही आकलन करते हुए – एंग्री यंगमैन के कामयाब सांचे में ढाला था, कुछ वैसा ही अर्णब गोस्वामी ने किया। यहां अर्णब ही सलीम जावेद थे और अर्णब ही अमिताभ बच्चन। बाकी दिग्गज प्राइम टाइम एंकर्स का भी वही हश्र हुआ जो अमिताभ के सामने उस दौर के दूसरे फिल्म स्टार्स का हुआ था।

जल्दी ही रेटिंग गेम में अर्णब व अन्य सितारा एंकर्स के बीच फासला इतना बढ़ गया कि उसे पाटना असंभव हो गया। अर्णब ने पत्रकारिता की आचार संहिता की कभी परवाह नहीं की। निष्पक्षता और संतुलन के नियम तो  न्यूज ऑवर की विंडोज से फेंके जाते थे। उसके विरोधी चिड़ते थे। परंपरा और नियमों की दुहाई देते थे। पर देश का माहौल ऐसा था कि जनता ताली बजाती थी। न्यूज़ टीवी की दुनिया में बाकी लोगों ने या तो अर्णब का अनुकरण किया या फिर जैसे थे वैसे बने रहे। रास्ता किसी ने कोई भी अपनाया लेकिन रेटिंग्स गेम में अर्णब की बढत बनी रही।

दूसरी तरफ बरखा को जनता यथास्थिति की पक्षधर और यूपीए के समर्थक के रूप में देख रही थी। साथ ही इन्हें मोदी के कट्टर आलोचक की तरह भी देखा जाता था। बरखा ने इस तथ्य को कभी छुपाया भी नहीं।

वहीं, अपनी व्यवस्था-विरोधी छवि और यूपीए के खिलाफ लगातार चलाए गए अपने अभियान – जो 2014 में कांग्रेस की पराजय के बाद भी जारी है– की बदौलत अर्णब को अब मोदी सरकार के समर्थक के रूप में देखा जाता है. एंटीइस्टेबलिशमेंट का पोस्टरब्वाय अब इस्टेबलिशमेंट का हिस्सा नजर आता है। वह एंग्री यंगमैन ही क्या जिसकी तलवार अब ज्यादातर सत्ता से बाहर बैठे लोगों पर ही उठती और चलती है।

बरखा-अर्णब की लड़ाई मात्र अहम और अहंकार का संघर्ष या दो विपरीत स्टाइल का टकराव भर नहीं है। बल्कि यह इस बात से भी जुड़ी है कि हमारी पूरी तरह ध्रुवीकृत बन चुकी राजनीति में कौन किस तरफ है. तटस्थ लोगों के लिए तो स्थान बचा ही नहीं है। या तो आप इस पाले में या उस पाले में। बरखा और अर्णब को भी यह चुनने की आजादी है कि उन्हें किस पक्ष की तरफ से लड़ना है, लेकिन मेरे जैसे व्यक्ति के लिए इन दोनों को इस तरह लड़ते हुए देखना कतई सुखद अनुभूति नहीं है। मैं इन दोनों में ही कई गुण देखता हूं। अलग अलग मुद्दों पर इनसे सहमति या असहमति हो सकती है लेकिन इनकी सफलता, जीवट और लोकप्रियता से इनकार कोई नहीं कर सकता। हमारे युवा पत्रकारों में से अधिकतर के लिए ये दोनों रोल-मॉडल हैं.

इसलिए अर्णब कृपा कर अपने शो में पत्रकारों को कटघरे में खड़ा करना बंद करें! हमारे यहां अब भी लोकतंत्र है। जैसे आपको अपनी मर्जी अनुसार खबर पेश करने और उसके विशलेषण करने की स्वतंत्रता है वैसे ही आजादी दूसरे पत्रकारों को भी है। उसका सम्मान कीजिए। और बरखा, किसी को चमचा कहना आपको शोभा नहीं देता। आपके लिए भी कितने लोग, किस किस तरह की बातें करते हैं और जिस तरह से आप उनका प्रतिकार करती हैं अपने पक्ष पर कायम रहती हैं वह निश्चय ही सराहनीय है। पर मन को ठेस तो इस तरह के संघर्ष में आपको भी जरूर लगती होगी। फिर एक हमपेशा के साथ ही यह टकराव कैसा व किस काम का।

थोड़ा आप लोग समय की नजाकत को भी समझें। ऐसे समय जब देश पत्रकारिता समेत अधिकतर संस्थाओं में भरोसा खो रहा है, आप दोनों —जो अनेक लोगों के रोल मॉडल हैं— की जिम्मेदारी बनती है कि इस पेशे की मर्यादा का ध्यान रखें।

संजीव श्रीवास्तव, एडिटप्लैटर के संस्थापक संपादक व बीबीसी के पूर्व संपादक हैं।

Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और ट्विटरपर फॉलो करे! हर पल अपडेट रहने के लिए डाउनलोड करें Hindi News App