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मायावती को करने हैं दो फैसले

BY Nalin | PUBLISHED: 10 September 2016

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यदि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) मुसलमानों और कांग्रेस पार्टी को लेकर समझदारी भरे फैसले करती है तो आगामी विधानसभा चुनाव के दंगल में वह काफी मजबूत स्थिति में होगी. यह आकलन है भारतीय राजनीति पर नजर रखने वाले पश्चिमी विशेषज्ञों क्रिस्टोफ जैफरलॉट और ज़िल वर्नियर्स का.

लेखकों ने इंडियन एक्सप्रेस में अपने आलेख में रेखांकित किया है कि संघ परिवार की शह पर चलाए गए गोरक्षा आंदोलन से मुस्लिम और दलित, दोनों ही समुदाय प्रभावित हुए हैं. दोनों ही उच्चतर जातियों के समर्थन वाली भाजपा को अपने शत्रु खेमे में देखने लगे हैं. ऐसे में यदि उत्तरप्रदेश के चुनावों में दोनों वर्गों को एक साथ लाया जा सके तो वे संभावित 40 प्रतिशत वोटर बेस के साथ एक अत्यंत प्रभावशाली ब्लॉक साबित होंगे.

दलितों और मुसलमानों को एक साथ करने का माद्दा बसपा में निहित है. दलित तो उसके परंपरागत समर्थक हैं ही, और मुसलमान पहले भी दलितों के साथ चुनावों में सक्रिय रह चुके हैं. उत्तरप्रदेश में ही 1962 और 1967 के चुनावों में दलित-मुस्लिम समीकरण के चलने के कारण अंबेदकर की पार्टी आरपीआई महाराष्ट्र से भी ज्यादा सफल रही थी. 1962 में जाटव नेता बीपी मौर्य ने, जो बौद्ध बन चुके थे, नारा दिया था- ‘जाटव मुस्लिम भाई भाई, हिंदू कौम कहां से आई?’

जैफरलॉट और वर्नियर्स के अनुसार कई अन्य कारक हैं जिन्हें देखते हुए मायावती को दलित-मुस्लिम समीकरण पर काम करना चाहिए. उन्होंने बसपा के संस्थापक कांशीराम का जिक्र किया है कि कैसे वे दलितों और अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों को साथ लेकर चलने के हामी थे. उनके द्वारा गठित यूनियन BAMCEF में B और M क्रमश: पिछड़े वर्गों और मुसलमानों के लिए था. लेखकों ने बसपा के पार्टी ढांचे में मुसलमानों को अपेक्षित संख्या में स्थान मिलने और टिकट वितरण में पर्याप्त अनुपात में प्रतिनिधित्व दिए जाने के रिकॉर्ड को आगामी चुनावों के लिए दलित-मुस्लिम गठजोड़ की संभावनाओं के पक्ष में पेश किया है. उन्होंने आंकड़ों के जरिए बताया है कि भले ही बसपा के जाटव आधार का क्षरण हुआ हो, लेकिन पिछले तीन चुनावों में उसे मुसलमानों का समर्थन बढ़ा है.

लेख में कहा गया है कि उत्तरप्रदेश में दलित-मुसलमान के साथ आने से बसपा को फायदा ही फायदा मिलना है. लेकिन उसे कांग्रेस को साथ लाने का भी प्रयास करना चाहिए. एक तो कांग्रेस का भी, सीमित ही सही, परंपरागत दलित-मुस्लिम आधार है जो बसपा के आधार से जुड़कर कमाल कर सकेगा. दूसरे, 2012 के चुनाव में बसपा उम्मीदवारों की जीत का अंतर बाकी दलों के मुकाबले कम रहने के तथ्य को देखते हुए भी कांग्रेस का साथ मिलना बसपा के लिए अहम होगा. भले ही बसपा के 26 प्रतिशत के मुकाबले 2012 के चुनाव में कांग्रेस को मात्र 12 प्रतिशत मत मिले थे, लेकिन यदि दोनों साथ होते तो बसपा-कांग्रेस गठजोड़ संख्या की दृष्टि से 2012 में अव्वल रहता.

क्रिस्टोफ जैफरलॉट और ज़िल वर्नियर्स के आलेख को अंग्रेजी में विस्तार से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

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Source - इंडियन एक्सप्रेस

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10 September 2016