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मीडिया पर क्यों है प्रिंट मीडिया का राज?

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पॉलिटिको मैगज़ीन में छपे एक लेख के ज़रिये जैक शैफ़र ने यह बताने की कोशिश की है कि क्यों आज भी मीडिया पर प्रिंट मीडिया का राज है, जैक खुद पिछले 20 सालों से ऑनलाइन पत्रकारिता कर रहे हैं लेकिन अख़बार से जुड़े अपने खूबसूरत अनुभवों के आधार पर ये बताया या कहें ये साबित करना चाहते हैं की क्यों प्रिटं मीडिया ऑल टाइम हिट है ?

जैक न्यूज़ पेपर को पढ़ते नहीं बल्कि कह सकते हैं पूजा करते हैं,उनके मुताबिक ऑनलाइन खबरों को पढ़ना अंतरिक्ष में खो जाने के समान है उन्हें याद ही नहीं रहता पहले उन्होंने किस पेज को क्लिक किया था। वो हर दिन चुनिंदा अखबारों को पढ़ते हैं और ये पाते हैं कि कई खबरें जो अखबारों में मिली वो ऑनलाइन नहीं थी। इतना ही नहीं वो दो सदियों में परिष्कृत अखबर के पन्नों उसके डिजाइन पर भी मुग्ध हैं, जिसे वो ऑनलाइन या वेब पर गुम पाते हैं कुछ ऐसी ही राय ED Bott ने पेश की वो प्रिंट में ख़बरों को परोसने के तरीके के भी मुरीद हैं। इंक  के कार्यकारी संपादक जॉन इन्हीं बातों को ऑनलाइन में गुम पाते हैं साथ ही वो कहते है अखबरों को पढ़ना किसी जंगल में शिकार और खोज के समान है हालांकि वो मानते हैं कि वेब में ऐसा होता है पर वहां एक खबर से दूसरी खबर के बीच की कड़ी कहीं गुम दिखती है।

जैक अखबार पढ़ने की तुलना व्यायाम से करते हैं, उन्हें अख़बार को हाथों में पकड़ कर उसे पढ़ना सुखद लगता है, वो The Financial Times अखबार को दुनिया का सबसे बेहतरीन अखबार मानते हैं लेकिन उसी अखबार को जब डिजिटल माध्यम पर पढ़ते हैं तो अपने पसंदीदा स्तंभकारों, सप्ताहांत संस्करण, समीक्षा, राय और कुछ खास निबंधों को न पढ़ पाने पर दुख व्यक्त करते हैं, हालांकि कुछ लोगों की राय है कि अखबार के लिए पैसे खर्च करने पड़ते हैं जबकि वेब पर अखबरों को पढ़ना सस्ता या कई बार मुफ्त होता है। जैक कहते हैं उनका अख़बारों से रोमांस है लेकिन बावजूद वो फोन और लैपटॉप पर खबरों को खंगालते रहते हैं।

बेवसाइट के बदलते और बद से बदतर होता स्वरूप और उसके वाणिज्यिक वेब सैलून में तब्दील होना मुद्दों से भटकना बेशक चिंता का विषय है । ऐसे में फिर क्या करने की ज़रूरत है? क्या महज़ खबरों पर होने वाले क्लिक को गिनना सफलता है? इन सब के बीच जैक कहते हैं पाठकों को ख़बरें मुहैया कराई जाएँ न कि उन्हें किसी जाल में फंसाया जाए और इन सबसे ऊपर माध्यम कोई भी हो सबसे पहले पत्रकारिता होनी चाहिए।

जैक शैफ़र का पूरा लेख यहाँ पढ़ें।

 

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Source - जैक शैफर, पॉलिटिको पत्रिका

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12 September 2016