यूरोप बनाम भारत: अब तक मगर है बाकी नामो निशाँ हमारा

BY Shivkant | PUBLISHED: 15 July 2016

 

मानव सभ्यताओं के बनने बिगड़ने, बसने उजड़ने का अपना एक लंबा इतिहास है। मैसोपोटामिया से लेकर हड़प्पा मोहनजोदड़ो और रोम से लेकर मिस्र तक अनेक सभ्यताएं फली-फूलीं और तबाह हुईं। यह सवाल प्राय: उठता है कि कौनसी सभ्यता संस्कृति सबसे मजबूत और टिकाऊ है। यह बहस आमतौर पर पूर्व और पश्चिम के बीच आकर बँट जाती है। पूर्व में जहाँ भारत होता है तो पश्चिम में यूरोप। यानी एक यूरोप तो दूसरी भारत का विचार है। इनको लेकर हमेशा ही सवाल रहा है। अब इक्कीसवीं सदी में फिर यूरोप के अस्तित्व पर सवाल उठ रहे हैं। यूरोप के यूरोपीय संघ से बाहर होने का फैसला इसमें नयी कड़ी है। अमेरिकी हिंदू अध्यापक डेविड फ़्रॉली ने अपने एक नये आलेख में यूरोप बनाम भारत की अवधारणा की तुलना की है।

उन्होंने लिखा है कि यूरोप की पहचान पर जहाँ आज एक बार फिर सवाल उठाए जा रहे हैं वहीं भारत अपने बीते इतिहास के सम्मान के साथ एक नये भविष्य, एक नयी सदी में कदम रख रहा है। इसमें सबसे बड़ी बात है कि यूरोप का इतिहास जहाँ दूसरे देशों पर हमलों और लूटपाट से भरा है वहीं भारत की पहचान ही उसकी संस्कृति और आध्यात्म है।

दरअसल यूरोप की जो अवधारणा है वह मूल रूप से औपनिवेशिक काल में सामने आई। उस दौर में जब दुनिया में यूरोपीय देशों का परचम लहरा रहा था। यह अलग बात है कि बीसवीं सदी में दो विश्व युद्धों ने यूरोप की समूची अवधारणा की नींव हिला दी। इसके बाद बीसवीं सदी में यूरोपीय संघ ईयू का विचार आया ताकि यूरोप की एकता बहाल करते हुए इस क्षेत्र को भविष्य के किसी युद्ध से बचाया जा सके। लेकिन आज यूरोप एक हिस्सा ही यूरोपीय संघ में है और हाल ही में ब्रिटेन ने इससे बाहर होने के पक्ष में मतदान किया है। ऐसे में यूरोप की यह नई अवधारणा, यूरोपीय संघ लंबे समय तक अपने अस्तित्व को बचाए रख सकेगा इसमें संदेह है।

डेविड कहते हैं कि उक्त सवाल केवल यूरोप के बारे में ही नहीं उठते, भारतीय विचार या भारतीय अवधारणा को लेकर भी उठते हैं। ऐतिहासिक रूप से विभाजित रहा भारत अनेक विदेशी हमलों की मार झेलता रहा है तो क्या उसकी कोई सांस्कृतिक पहचान भी है। कई स्कालर कहते हैं कि आजादी यानी 1947 से पहले कोई वास्तविक भारत नहीं था बल्कि सिर्फ दक्षिण एशिया का इतिहास था।

डेविड ने पहला सवाल यूरोप की भौगोलिक पहचान को लेकर उठाया है और कहा है कि यूरोप को एक महाद्वीप या महादेश कहना ही अपने आप में एक मिथक है। वास्तव में तो यह कई क्षेत्रों से मिलकर बना एक क्षेत्र है। यह अपने आप में कोई महाद्वीप नहीं है।

दूसरा सवाल यूरोप की सांस्कृतिक पहचान को लेकर है। इतिहासकारों के अनुसार यूरोपीय संस्कृति की नींव यूनानियों ने रखी। लेकिन यूनान के इलाकों में वह भी शामिल था जिसे हम आजकल तुर्की कहते हैं।
आलेख में पंद्रहवीं सोलहवीं शताब्दी के पुनर्जागरण काल का भी जिक्र करते हुए कहा गया है कि आधुनिक यूरोपीय पहचान वास्तव में तभी सामने आई। और उसके बाद औपनिवेशिक काल में यूरोप की तूती बोलने के काल के संदर्भ में डेविड ने कहा है कि हमें याद रखना चाहिए कि औपनिवेशिक यूरोप का निर्माण अमेरिकी सोने, अश्वेत अफ्रीकियों की मेहनत तथा भारत व चीन जैसी महान नागरिक सभ्यताओं के शोषण से हुआ।

आलेख के अनुसार राजनीतिक एकता के अभाव तथा देश के एतिहासिक रूप से प्रांतों यानी राजे रजवाड़ों में बँटे होने के कारण भारत की पहचान को लेकर प्राय: सवाल उठाए जाते हैं। लेकिन यह भी सच है कि यूरोप भी राजनीतिक रूप से कभी एक नहीं रहा और आज तो वह भारत से भी कहीं अधिक बिखरा हुआ है। डेविड ने कहा है कि पारंपरिक उपमहाद्वीपों के साथ भारत आज एक राष्ट्र है। भारत की सांस्कृतिक एकता यूरोप से कहीं अधिक मजबूत व प्राचीन है जिसे यहाँ की परंपराओं, त्योहारों व धार्मिक आयोजनों में देखा जा सकता है।

दुनिया पर भारत के प्रभाव का जिक्र करते हुए डेविड ने कहा है कि भारतीय विचार या भारत का विश्व पर असर उसकी संस्कृति तथा आध्यात्मक के बल पर है न कि बड़ी विशाल सेनाओं और राजनीति की वजह से।

इसके अनुसार यूरोप ने सैन्य व उपनिवेश के जरिए विस्तार किया तो भारत का प्रभाव दूसरे देशों पर चढ़ाई, तबाही या मारकाट के कारण नहीं रहा है। यही कारण है कि यूरोप की पहचान को लेकर जहाँ आज फिर सवाल उठाए जा रहे हैं  वहीं भारत एक नयी सदी में आगे बढ़ रहा है।

डेविड फ़्रॉली डेविड वेदों, योग व आयुर्वेद पर 30 से अधिक किताबें लिख चुके हैं।

उनका पूरा आलेख यहां पढ़ें।

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