राब्ता ज़रूरी है नई सहर के लिए

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मैं जब भी भारत आती हूं, अजीब तरह की मनोदशा हावी होने लगती है. बीते दिनों आगरा गई थी, जहां तमाम ऐसे लोग मिले, जिनकी यादें पाकिस्तान से जुड़ी हैं. यहां लोग पाकिस्तान के टीवी सीरियल्स और कलाकारों की बातें करते हैं. पाकिस्तानी संगीत की बातें करते हैं, वहां की दर-ओ-दीवार से जुड़ी यादें साझा करते हैं.

पाकिस्तानी पत्रकार हुमा युसुफ़ ने डॉन अख़बार में छपे अपने लेख में लिखा है कि वक्त के साथ जैसे-जैसे विभाजन के पहले की पीढ़ियां खत्म होती चली जाएंगी, यादें हाशिए पर जाती जाएंगी और जंग की बातें, आग उगलती तहरीरें और राजनीतिक बयानबाजियां ही जानकारियों का स्रोत बनती चली जाएंगी.

इन हालात में, दोनों मुल्कों के बीच की चर्चाएं वन डायमेंशनल होने लगेंगी. बातचीत का दायरा संकरा होता जाएगा, तो संबंधों की तल्खी खुद-ब-खुद बढ़ती चली जाएगी.

कमेंटेटर सदानंद धुमे ने नरेंद्र की मोदी पाकिस्तान नीति को लेकर जो ताजा ब्योरा पेश किया है, अनिश्चय की स्थिति, अस्थिर प्यार और उदासीन रूखापन” यह पाकिस्तान पर भी समान रूप से लागू होता है. सरकारों की ये ढुलमुल नीतियां हालात बिगाड़ने का ही काम करेंगी.

इनसे बचने का एक ही रास्ता है कि तकियाकलामों को छोड़कर आगे बढ़ा जाए और दोनों मुल्कों के अवाम के ताल्लुकात और मजबूत बनाने को लेकर प्रयास किए जाएं, क्योंकि आतंकवाद के अलावा भारत के लोग पाकिस्तान को बेहतरीन संगीत के लिए भी जानते हैं.

ऐसे में जरूरत है कि लोगों को दूसरे देश के बारे में ज्यादा से ज्यादा पढ़ने, जानने और समझने का मौका दिया जाए, ताकि दूसरे देश के प्रति समझ परिपक्व हो और तार मजबूत हो. और इसके लिए सिर्फ कॉफी विद करण में फवाद खान का आना काफी नहीं है, ऐसा मौका तो दोनों देशों के हर नौजवान को मिलना चाहिए.

हुमा यूसुफ का पूरा लेख यहां पढ़ें

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Source - हुमा यूसुफ़, डॉन

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12 September 2016