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सिद्धू का मामला: दोष खुद बीजेपी का

संसद के मानसून सत्र को बीजेपी के लिए निर्बाध बताया जा रहा था क्योंकि जीएसटी बिल का विरोध करते रहे दल इसे पारित कराने पर सहमत दिख रहे थे. इसे पारित किए जाने में कोई संदेह नहीं रह गया था, सवाल मात्र यह था कि यह कब होगा? जीएसटी के पारित होने के आसार से सत्तारूढ़ दल का आत्मविश्वास और बढ़ा हुआ था.

बीजेपी ने असम में सरकार बनाते हुए पूर्वोत्तर में जीत का स्वाद चखा, दो साल के सूखे के बाद इस साल इंद्र देवता भी मेहरबान नजर आए, मंत्रिमंडल में फेरबदल और विस्तार को आमतौर पर मास्टर स्ट्रोक के तौर पर देखा गया जिसमें राजनीतिक संदेश, क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं, जातीय समीकरण और प्रशासनिक ज़रूरतों में संतुलन बिठाया गया था. और भारतीय अर्थव्यवस्था और शेयर बाज़ार न सिर्फ ब्रेग्जिट के तूफान को भलीभांति झेल गए, बल्कि इनके अच्छे प्रदर्शन के लिए इससे बढ़िया अवसर भी नहीं हो सकता था. हमारा अपना रेग्जिट – आरबीआई के गवर्नर रघुराम राजन का दूसरे कार्यकाल से पहले इस्तीफा – अंतरराष्ट्रीय शोरगुल में दब गया.

बीजेपी के लिए सबकुछ बढ़िया चल रहा था, या चलता दिख रहा था. लेकिन पिछले कुछ दिनों के राजनीतिक घटनाक्रम ने पार्टी को अपनी बढ़त विरोधियों के हाथों सौंपने पर मजबूर कर दिया. समयपूर्व सुविचारित योजनाएं बनाने वाला बीजेपी नेतृत्व, जो रणनीति, तेज़ी और संसाधनों के बल पर विरोधियों को पीछे छोड़ने पर गर्व करता था, अब उतना सक्षम नहीं दिख रहा. जीतने की काबिलियत, दक्षता और मास्टर स्ट्रोक – सब बीजेपी से दूर होते दिख रहे हैं, और पार्टी नेतृत्व को रणनीति और चतुराई के मामले में विरोधियों से मात खानी पड़ रही है.

अरुणाचल प्रदेश

यह सब शुरू हुआ अरुणाचल प्रदेश से. नि:संदेह राज्य में राजनीतिक घटनाक्रम में मोड़ आया सुप्रीम कोर्ट के आदेश से, लेकिन बीजेपी को इसका अंदेशा होना चाहिए था, खासकर उत्तराखंड के फैसले के बाद. जिस कुशलता से कांग्रेस ने खुद को संभाला, अपने समर्थकों को एकजुट किया और बीजेपी को उसकी ही चाल में मात दी, उससे पार्टी में जान आ गई है. वो भी ऐसे समय जब दम तोड़ती नज़र आती पार्टी राजनीतिक रूप से धीरे-धीरे मिट जाने की अपमानजनक स्थिति को नियति मान रही थी.

अरुणाचल में कांग्रेस की वापसी ने, जिसे देश के सर्वाधिक बिकने वाले अखबार ने “कांग्रेस ने हार के मुंह से जीत खींच लिया” शीर्षक दिया था, कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को उम्मीद और आत्मविश्वास दिया है.

कांग्रेस नेतृत्व मई 2014 की बड़ी हार के बाद से जो काम नहीं कर सकी थी, उसे अरुणाचल में बीजेपी ने अपने बेमतलब और बेमौके के अतिउत्साह से संभव कर दिया. यदि पार्टी नेतृत्व हेमंत विश्व शर्मा जैसे लोगों की राय पर चलता रहा, जोकि असम में चुनाव के ठीक पहले कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए थे तो पार्टी भविष्य में भी इस तरह की नादानी कर सकती है. इसके बाद उत्तरप्रदेश में शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की कांग्रेस की घोषणा आई. इस बात की संभावना नहीं है कि वह और राज बब्बर कांग्रेस को जीत दिला सकेंगे, लेकिन यदि लखनऊ में कांग्रेस के रोड-शो से कोई संकेत निकालें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि दोनों ने पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह ज़रूर भर दिया है. दीक्षित के उत्तरप्रदेश के चुनावी समर में कूदने से बीजेपी के लिए स्थिति और उलझ गई है जोकि इस महत्वपूर्ण राज्य में बिना किसी रणनीति के नज़र आ रही है.

कौन बनेेगा मुख्यमंत्री?

जब उत्तरप्रदेश में तीन अन्य दल अखिलेश यादव, मायावती और शीला दीक्षित के रूप में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार पेश कर रहे हों, बीजेपी कितने दिनों तक इस सवाल से बच सकती है. भले ही बीजेपी यह कहती रही हो कि वह मुख्यमंत्री पद के लिए किसी को प्रोजेक्ट नहीं करेगी, या समय आने पर कोई नाम घोषित करेगी, लेकिन हकीकत में शीला दीक्षित के मैदान में उतरते ही उसके विकल्प सीमित रह गए हैं. संभव है वो अब भी मुख्यमंत्री पद के लिए किसी उम्मीदवार को आगे नहीं करे यह कहते हुए कि उसके पास योग्य नेताओं की भरमार है, लेकिन उसकी दुविधा अब छुपी नहीं रह गई है.

निश्चय ही भारत के सर्वाधिक आबादी वाले राज्य के मतदाताओं का, जिन्होंने 2014 में एनडीए के 71 सांसदों को चुनकर भेजा, यह जानने का हक बनता है कि 2017 में यदि वे बीजेपी को वोट करते हैं तो उनका मुख्यमंत्री कौन होगा. जीत दिलाने में जिस एक नेता – वरुण गांधी – पर पार्टी भरोसा कर सकती थी, वह एक गलत सरनेम के बोझ तले दबे हुए हैं.

उत्तरप्रदेश की लड़ाई में किसी विजेता की निश्चित भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है, पर भाजपा निश्चय ही गंभीर दावेदारों में से एक है. लेकिन यहां के घटनाक्रम भी भाजपा को एक प्रतिक्रियावादी बल के रूप में दर्शाते हैं, नकि पहले से सक्रिय कोई ताकत.

NEW DELHI, INDIA: Former Indian cricketer and current Member of Parliament Navjot Singh Sidhu gestures while addresing media representatives in New Delhi, 21 July 2005. Sidhu highlighted various developments regarding his Amritsar constituency in the northern Indian state of Punjab. AFP PHOTO/ Manan VATSYAYANA (Photo credit should read MANAN VATSYAYANA/AFP/Getty Images)

सिद्धू का मोहभंग

लेकिन बीजेपी को सबसे बड़ा धक्का लगा है पंजाब में – नवजोत सिंह सिद्धू के जाने से. सिद्धू के खेमा छोड़ने से पार्टी ने पंजाब में अपना सर्वाधिक करिश्माई नेता गंवा दिया है. सिद्धू एक करिश्माई व्यक्ति के अलावा सही जाति (जाट सिख) के भी है. सिद्धू ने पार्टी को पंजाब में चेहराविहीन तो किया ही, साथ ही इस्तीफा देने के लिए उन्होंने जो वक्त चुना उसने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को शर्मिंदा और विचलित कर छोड़ा है.

सिद्धू ने मानसून सत्र के पहले दिन और राज्यसभा के लिए चुने जाने के कुछ सप्ताह के भीतर ही इस्तीफा दिया है. बादल-जेटली युगल से सिद्धू की नाराजगी किसी से छुपी नहीं है, ऐसे में किसने उनकी चुप्पी के बदले राज्यसभा की सदस्यता का सौदा तय कराया था?

यदि अटकलों के अनुरूप सिद्धू पंजाब में आप के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित किए जाते हैं तो विधानसभा चुनाव नि:संदेह दिलचस्प हो जाएंगे.

आइए संभावित परिणामों पर गौर करते हैं: अकाली-बीजेपी गठजोड़ अपने विरोधी मतों का कांग्रेस और आप के बीच विभाजन देखना चाहता है. इसका मतलब होगा एनडीए की एकबार फिर सरकार में वापसी. कांग्रेस चाहेगी कि उसके वोट शेयर में कोई कमी नहीं हो और साथ ही सरकार विरोधी मत भी उसे मिले. इससे कांग्रेस की जीत सुनिश्चित होगी. वहीं आप दिल्ली चुनाव का दोहराव चाहेगी यानि उसे सत्ता-विरोधी मत मिल जाएं और कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो जाए.

यही तो हुआ था 2014 में, जब आप ने पंजाब में 24 प्रतिशत वोट शेयर पाया था, अकाली दल से बस थोड़ा कम. और उसे अकाली दल के बराबर ही चार सीटें मिली थीं.

और यह तीसरा परिदृश्य ही है जो बीजेपी को परेशान कर रहा है. वह पंजाब में कांग्रेस से हारने पर उतना विचलित नहीं होगी. लेकिन आप को यदि जीत मिली तो पार्टी और उसके नेता अरविंद केजरीवाल राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ जाएंगे. पंजाब में यदि आप जीती तो बीजेपी गुजरात में हर ओर आप कार्यकर्ताओं को देखेगी जहांकि दिसंबर 2017 में चुनव होने हैं.

बीजेपी को फिर से ऊर्जावान हुई कांग्रेस से 2019 में निबटने में ज्यादा परेशानी नहीं होगी. लेकिन फिर से फॉर्म में आए केजरीवाल और आप से निबटना उसके लिए आसान नहीं होगा.

यह ऐसा परिदृश्य है जिसे सिद्धू को भागने के लिए मजबूर करके बीजेपी ने संभवत: खुद ही अपने लिए गढ़ा है.

(संजीव श्रीवास्तव एडिटप्लेटर डॉटकॉम के संस्थापक-संपादक हैं। उनसे [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है.)

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