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हरियाणा के लिए जैन पाठ

BY Nalin | PUBLISHED: 2 September 2016

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जैन साधु तरुण सागर जी के हरियाणा विधानसभा को संबोधित करने से उत्पन्न विवाद के कारण विभिन्न संवैधानिक और सांस्कृतिक मतभेदों पर प्रकाश पड़ा है. इस विवाद में दिखे पूर्वाग्रहों से संविधान की चिंता करने वालों और धर्म की कद्र करने वालों दोनों को ही चिंतित होना चाहिए. ये विचार राजनीतिक-सामाजिक मामलों के विश्लेषक प्रताप भानु मेहता के हैं.

इंडियन एक्सप्रेस के अपने ताजा स्तंभ में मेहता ने सबसे पहले विधायिका के एक सदन को संभाषण कक्ष के रूप में इस्तेमाल किए जाने पर ही सवाल खड़ा किया है. उनका कहना है कि हरियाणा के विधायकों के एक समूह को सदन कक्ष में किसी साधु का संबोधन अलग बात होती, लेकिन उसका विधानसभा सत्र को संबोधित करना एक गंभीर बात है. कम-से-कम संसद के सदनों में इस तरह के किसी संबोधन की कल्पना नहीं की जा सकती है.

पर मेहता के अनुसार इससे कहीं ज्यादा चिंताजनक बात है तरुण सागर जी के संबोधन का वह मूल विचार कि धर्म को चाहिए कि वह राजनीति को वश में रखे. समाज को धर्म और राजनीति दोनों की ही ज़रूरत है, लेकिन दोनों परस्पर समानांतर चले. उन्हें आपस में उलझाया नहीं जाना चाहिए क्योंकि दोनों के अपने अलग-अलग भाव हैं. यदि दोनों को परस्पर मिलाया जाता है तो धर्म के सत्ता के असर में दूषित होने की आशंका रहेगी.

अपने आलेख के अंत में मेहता ने आश्चर्य व्यक्त किया है कि एक साधु लोकनीति के क्षेत्र में अपनी पैठ करते हुए नैतिक प्रोत्साहन और अनुशासनात्मक उपायों की चर्चा तो करता है लेकिन धर्म और अध्यात्म के उन पहलुओं को नहीं छेड़ता जहां से कि स्त्री-पुरुष और असामनता से जुड़े सवाल उत्पन्न होते हैं. असल सवाल धर्म के सहारे राजनीति को वश में करने का नहीं, बल्कि धर्म की अलग तरह की समझ विकसित करने का है. तरुण सागर जी ने अनचाहे ही साबित किया है कि धर्म जब राजनीति में लिपट जाता है तो  उसमें सचमुच के धार्मिक सवालों से निपटने की क्षमता नहीं रह जाती है.

प्रताप भानु मेहता का पूरा आलेख अंग्रेजी में यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं

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Source - प्रताप भानु मेहता, इंडियन एक्सप्रेस

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2 September 2016