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क्या लौटेगा नगा उथल-पुथल का दौर

नगा

नगा विद्रोहियों के दूसरे सबसे बड़े गुट के नेता एस एस खापलांग के निधन ने उस दौर के मुंह पर रखे पत्थर को हटा दिया है, जिसे मैं ‘नगा-अराजकता’ कहता आया हूं। नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन-के) के म्यांमार स्थित गुट के मुखिया खापलांग बीते नौ जून को इस दुनिया से विदा हो गए। उनका गुट उत्तरी और पूर्वी नगालैंड में भी जनाधार रखता है और अरुणाचल प्रदेश के कई नगा-बहुल जिलों में भी उसकी प्रभावशाली मौजूदगी है। खापलांग की मौत के बाद उनके उत्तराधिकारी को लेकर तो अटकलें तेज हैं ही, इस गुट की सरपरस्ती में पूर्वोत्तर भारत में, खासकर मणिपुर व असम के कुछ हिस्सों में सक्रिय दूसरे विद्रोही गुटों के रुख को लेकर भी तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। मसलन, भारत सरकार के साथ फिर से संघर्ष विराम के लिए जारी कोशिशों का क्या होगा, क्योंकि करीब दो-ढाई साल पहले खापलांग ने अचानक ही उस संघर्ष विराम को तोड़ दिया था, जो 2001 से प्रभावी था?

जहां तक उत्तराधिकारी की बात है, तो एक संभावना यह है कि कोन्याक जनजाति के किसी नगा को अध्यक्ष की हैसियत दी जा सकती है, ताकि कोन्याक नगाओं को संतुलित किया जा सके, क्योंकि 1,000 से अधिक कोन्याक नगा इस गुट का हिस्सा हैं। और पहले की व्यवस्था की तरह गुट का मुख्य कार्यवाहक अधिकारी किसी हेमी नगा को बनाया जाए। खापलांग खुद हेमी नगा जनजाति के थे। अध्यक्ष की दौड़ में सबसे आगे खांगो कोन्याक दिख रहे हैं, जिन्हें खापलांग ने खुद उपाध्यक्ष बनाया था। हालांकि उनकी राह में एक अन्य कोन्याक नगा नेता ही मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं, जो गुट के प्रबंधन में माहिर माने जाते हैं। वैसे, नजरें निकी सुमी पर भी रहेंगी, जो इस गुट का सैन्य सलाहकार रह चुके हैं और खापलांग उनके छापामार-युद्ध कौशल पर भरोसा किया करते थे। नगालैंड की सेमा जनजाति के निकी सुमी 12 जून को खापलांग को आखिरी सलामी देने के लिए उनके अंतिम संस्कार में भी मौजूद थे।

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Source - सुदीप चक्रवर्ती, हिंदुस्तान

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