GST में खेतीबाड़ी को लेकर भ्रम

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वस्तु व सेवा कर GST लंबे समय से चर्चा में रहा है। राजनीतिक गलियारों से लेकर, बनियों और आम लोगों तक में। कई साल तक अटके रहने के बाद इससे जुड़ा जीएसटी संविधान संशोधन विधेयक हाल ही में संसद ने पारित कर दिया। अब उम्मीद और कोशिश की जा रही है कि देश में अगले वित्त वर्ष से जीएसटी कानून लागू हो जाए। लेकिन GST में खेतीबाड़ी और किसानों को लेकर क्या रुख है। भारत कृषक समाज के अध्यक्ष अजयवीर जाखड़ ने यह सवाल उठाया है। उन्होंने इकनॉमिक टाइम्स में एक आलेख में जीएसटी में खेतीबाड़ी को लेकर अपनाए गये रुख को एक तरह से मजाकिया करार दिया है।

इसमें उन्होंने लिखा है— जब कोई नीति अपने लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाती तो इसके लिए प्राय: क्रियान्वयन संबंधी दिक्कतों को दोषी बताया जाता है। लेकिन वास्तव में नीतियां इसलिए विफल हो जाती हैं क्योंकि उनकी डिजाइनिंग ही गलत होती है। नीतियां बनाते समय प्रस्तावित लाभान्वितों या उन्हें जमीनी स्तर पर लागू करने वालों को भरोसे में नहीं लिया जाता है। आमतौर पर नीतियों का क्रियान्वयन पटवारी, खंड विकास अधिकारी जैसे जमीन अधिकारी या कर्मचारी करते हैं लेकिन नीतियां बनाते समय उन्हें कोई नहीं पूछता। कमोबेश यही स्थिति देश के सबसे बड़े कर सुधार जीएसटी संविधान संशोधन विधेयक की है। जीएसटी कानून का मसौदा पढ़कर आप हंसते रह जाएंगे।

जाखड़ के अनुसार— GST कानून के हिसाब से ‘कृषि’ में फूलों की खेती, बागवानी, फसलों की परवरिश, घास व चराई आदि शामिल है। लेकिन डेयरी, मुर्गीपालन, फल इकट्ठे करना, मानव निर्मित जंगलों की परवरिश तथा पौध या पौधों का पालन इसमें शामिल नहीं है। तो इस तरह से जीएसटी के व्यावहारिक उद्देश्य के लिहाज से अंडे या गाय के दूध पर कर लग सकता है। मीट बेचना शायद जीएसटी के दायरे में नहीं आए क्योंकि पशु चराई को कृषि माना गया है। घास उगाना कर दायरे में हीं है लेकिन आदिवासियों द्वारा वन उत्पाद संग्रहण निश्चित रूप से कर दायरे में आएगा।

अपने आलेख में जाखड़ ने इस तरह की अनेक कतिपय विसंगतियों को रेखांकित किया है। उनका कहना है कि खेतीबाड़ी में बहुत सी खेती आमतौर पर हिस्सेदारी पर होती है। एक ऐसी व्यवस्था जिसमें जमीन का मालिक व खेती करने वाला लागत, खर्च व उत्पादन आदि को एक तय हिस्से पर बांट लेता है। नये जीएसटी कानून में इस तरह के व्यवस्था पर कर लगाने का प्रस्ताव है जबकि फसल उगाने को लेकर किसी समझौते को परिभाषित करना असंभव है।

जाखड़ ने जीएसटी कानून में खेतीबाड़ी को लेकर की गई इन त्रुटियों को ब्रिटिश राज की विरासत करार दिया है जिसे हमारे नेता इतनी आसानी से समाप्त नहीं होने देंगे।

जीएसटी और खेतीबाड़ी पर अजयवीर जाखड़ का पूरा आलेख यहाँ पढ़ें।

 

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Source - अजयवीर जाखड़, इकनॉमिक टाइम्स