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गुजरात में आनंदी बेन की जगह विजय रुपाणी को मुख्यमंत्री बनाया गया है। पटेलों के आरक्षण आंदोलन की आग ठंडी नहीं हुई थी कि उना हो गया। उत्तर प्रदेश में चुनाव आसन्न हैं। वरिष्ठ पत्रकार व लेखक हरीश खरे ने इन सब घटनाओं को ध्यान में रखते हुए कहा है कि गुजरात के कथित विकास माडल में दरारें नजर आ रही हैं। दैनिक ट्रिब्यून में अपने आलेख में हरीश खरे ने लिखा है कि केंद्र में नरेंद्र मोदी की भारी सफलता से मुस्लिम विरोधी सामाजिक ढांचा टूटा है।

हरीश खरे ने अपने आलेख की शुरुआत पटेलों के आंदोलन का जिक्र करते हुए की है। उन्होंने लिखा है कि 11 महीने पहले उन्होंने अपने एक कॉलम में उल्लेख किया था कि पटेलों के आरक्षण संबंधी आंदोलन ने कथित गुजरात मॉडल को किस तरह से दीर्घकालिक नुकसान पहुंचाया। इसके बाद निंदा व बदनामी का वही समूह गान हुआ कि कोई नरेंद्र मोदी व उनके गुजरात के बारे में इस तरह से, बिना भक्तिभाव कैसे बात कर सकता है। यहां हरीश खरे ने 25 अगस्त 2015 का जिक्र किया है जबकि 22 साल के हार्दिक पटेल राज्य सरकार के खिलाफ एक बहुत बड़ी रैली करने में सफल रहे। दरअसल यह महीनों पुराने आंदोलन की परिणति था। अलार्म बहुत स्पष्ट व जोर से बज रहा था जो कि केवल बहरे व अक्खड़ लोगों को नहीं सुना।

खरे ने लिखा है— इसके 11 महीने बाद गुजरात में मुख्यमंत्री बदल गया। इस बदलाव को गुजरात में अव्यवस्था व असंतोष को शांत करने के प्रयास के रूप में देखा गया। दो साल भी नहीं होंगे जबकि ‘साहेब’ के दिल्ली चले जाने पर आनंदीबेन मुख्यमंत्री बनीं। आनंदीबेन को मुख्यमंत्री बनाए जाने को प्रेरक कदम के रूप में सराहा गया। एक महिला मुख्यमंत्री, गुजरात में पहली बार। विश्वसनीय सहयोगी। सब बातें हुईं।

और फिर 2015 को पटेल आंदोलन हो गया। 1980 के दशक से ही भाजपा की ‘अशिष्ट व प्राय: हिंसक’ राजनीति को संबल देने वाला समुदाय अब उसके खिलाफ हो गया। यह समुदाय दुनिया को यह बता रहा था कि उसकी भी एक चिंता है कि आर्थिक संपन्नता उससे कोसों दूर हो गई है। अचानक हुआ क्या कि बहुप्रचारित ‘गतिशील गुजरात’ माडल को लेकर सामाजिक व राजनीतिक पराधीनता भाव को लोगों ने नंगी आंखों से, बिना किसी ‘चश्मे’ के देखा। इस बारे में सारे छुपे छुपाए तथ्य व सच्चाइयां अचानक सामने आने लगीं। और दो साल के भीतर ही ‘निष्ठावान’ आनंदीबेन को एक ‘बेरंग व औसत दर्ज के आदमी’ के लिए रास्ता छोड़ना पड़ा। विजय रूपाणी नये पदासीन हैं और शायद नया बलि का बकरा भी।

खरे ने अपने आलेख में गुजरात में राजनीतिक परिदृश्य व भाजपा की अंदरुनी उठा पटक व विभिन्न मुद्दों पर उसके रुख के बारे में बात की है। उन्होंने बहुचर्चित उना कांड का जिक्र करते हुए लिखा है: उना में हुई हिंसा के बारे में केवल एक ही बात नयी है वह यह कि यह सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और एक तरह से राष्ट्रीय मुद्दा बन गया। भाजपा की माफी में जो भय या घबराहट है वह किसी अंतर्भूत अनौचित्य या अन्याय के कारण नहीं है बल्कि इस सारे मामले के ‘खुलासे’ के कारण उत्तर प्रदेश में पार्टी को होने वाले संभावित नुकसान हो लेकर है।

हरीश खरे का पूरा आलेख यहां पढ़ें।

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Source - हरीश खरे, ट्रिब्यून