कैसे पत्रकारों को चुप कराने की कोशिश करती हैं कंपनियाँ!

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कंपनियों के काले कारनामों और राजनेताओं के दोगलेपन को उजागर करने की कोशिश कर रहे पत्रकारों को खरीदने की कोशिश होती है। साम, दाम, दंड, भेद.. किसी भी तरीके से उन्हें चुप कराने का प्रयास किया जाता है ताकि जो ‘काला’ है वह दबा रहे और सम्बद्ध कंपनियों या नेताओं की सार्वजनिक जीवन में चमक बनी रहे। खोजी पत्रकार जोसी जोसेफ की नयी किताब इसी मुद्दे पर केंद्रित है।

जोसेफ ने अपनी किताब ‘ए फीस्ट ऑफ वल्चर्स’ में अपने साथ हुई ऐसी घटनाओं को बताने की कोशिश की है कि उन्हें चुप कराने के लिए किस तरह की पेशकश की गईं। किताब हार्परकालिंस इंडिया ने प्रकाशित की है।

इसमें जोसी जोसेफ ने लिखा है कि जब आप देश या देश की अर्थव्यवस्था को चला रहे लोगों के दोहरे मानदंडों या चरित्र को सामने लाने की कोशिश करते हैं और उनके दोगलेपन के सबूत पेश करते हैं तो वे आपको चुप कराने के लिए कई चालाक कोशिशें करते हैं। हां, यह हमेशा कोई डराने धमकाने वाला तरीका नहीं होता।

जोसेफ ने इस लिहाज से अपने साथ हुई कई घटनाओं का जिक्र किया है। उन्होंने बताया कि एक बार दिल्ली के सबसे महंगे बाजारों में से एक खान मार्केट के एक रेस्त्रां में उनकी एक पूर्व पत्रकार से बैठक हो रही थी। उनसे जो पूर्व पत्रकार मिलने आया था वह थोड़े दिन पहले तक एक हिंदी समाचार चैनल में था और अब उसने मुंबई में एक करोड़पति उद्योगपति के प्रवक्ता का काम संभाल लिया था। तनख्वाह मोटी थी।

दरअसल यह फरवरी 2011 की बात है जबकि केंद्र में सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार एक के बाद एक घोटालों व विवादों में घिर रही थी। मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली सरकार के तीन साल बाकी थे और नित नये घोटालों के सामने आने से सरकार की नींद हराम थी।

इसी साल देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा आंदोलन देखने को मिला।

खैर, उस अरबपति का यह प्रवक्ता मुंबई से हवाई यात्रा कर मुझसे मिलने दिल्ली आया था। जबकि थोड़े दिन पहले ही उसके बॉस के वकीलों ने मुझे व मेरे अखबार को आपराधिक मानहानि का नोटिस भेजा था। दरअसल मैंने अपनी एक रपट में उसके बॉस के संबंध एक अपराधी सरगना से होने की बात कही थी। जब नोटिस आया तो हमने जवाब दिया कि हमारे पास अपने दावों के समर्थन में सभी दस्तावेज हैं जिन्हें हम उचित न्यायिक मंच में पेश करेंगे।

जोसेफ के अनुसार- शायद हमारे इस तरह के शांत व बेफिक्र जवाब से उद्योगपति को अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ा। उनके पीआर मैनेजर ने अपने बॉस की तरफ से माफी मांगते हुए कानूनी नोटिस को ‘गलती’ करार दिया और कहा कि उनके बॉस ने तो अपनी कानूनी टीम से आपको नोटिस नहीं भेजने को कहा था। जोसेफ के अनुसार-हालांकि हम दोनों ही जानते थे कि यह कोई गलती नहीं थी।

इसके बाद प्रवक्ता ने धीरे से कहा,’मेरे बॉस आपसे आग्रह करना चाहते हैं कि आप उनके संबंधों के बारे में कुछ नहीं लिखें क्योंकि आपके आलेख से इससे विदेशी निवेश जुटाने के हमारे प्रयासों को बहुत धक्का लगता है।’ दरअसल यह कंपनी एक निवेशक से 3000 करोड़ रुपए जुटाने की कोशिश कर रही थी।

जोसेफ के अनुसार उस प्रवक्ता ने इसके बाद असली पेशकश करते हुए कहा,’मेरे बॉस आपको बताना चाहते हैं कि आपकी हर जरूरत को पूरा कर सकते हैं..गाड़ी, घर या कुछ भी’। उस पूर्व पत्रकार ने आसपास के बड़े बड़े बंगलों की ओर इशारा करते हुए कहा,’क्या आप इनमें से कोई घर लेना चाहेंगे।’ जोसेफ के अनुसार इसके बाद उन्होंने यह बैठक खत्म कर दी और वहां से चले गए।

जोसेफ ने अपनी किताब में इस तरह की कई घटनाओं का जिक्र किया है जिसमें राजनेता या कंपनियों ने अपने उलटे कामों से जुड़ी खबरों को रुकवाने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाए। उन्होंने यह भी बताने की कोशिश की है कि हमारी व्यवस्था के हर हिस्से में भ्रष्टाचार इस तरह बैठा हुआ है कि बिना कोई रिश्वत दिए न कोई फाइल आगे बढ़ती है, न कोई सौदा सिरे चढ़ता है। यहां हर चीज ‘मैनेज’ की जाती है या ऐसा करने की कोशिश की जाती है चाहे व मीडिया हो या सरकारी अफसर।

किताब के अंश यहां पढ़ें।

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Source - ए फीस्ट ऑफ वल्चर्स, लेखक: जोसी जोसेफ़