एफ-16 लड़ाकू विमानों का नया निर्माण केंद्र बन सकता है भारत

f16 jet

लॉकहीड मार्टिन कंपनी ने अपने एफ-16 लड़ाकू विमान बनाने का सारा काम भारत में स्थानांतरित करने का प्रस्ताव किया है जो कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बड़ी बात हो सकती है क्योंकि यह एक तरह से पड़ोसी प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान पर रणनीतिक जीत है। ब्लूमबर्ग में प्रकाशित एक रपट के अनुसार प्रस्ताव के तहत विमानों की खरीद में भारत की बात सुनी जाएगी। यानी सौदे के तहत पाकिस्तान को एफ-16 के कलपुर्जे हासिल करने में कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है।

रपट के अनुसार इस प्रस्ताव से इस प्रस्ताव के तहत एफ-16 लड़ाकू विमान व उसके कलपुर्जे़ किस देश को बेचे जाएंगे किसे नहीं, यह फैसला करने का आंशिक अधिकार अमरीका के साथ साथ भारत को मिल जाएगा। ब्लूमबर्ग ने जानकार सूत्रों के हवाले से यह रपट प्रकाशित की है हालांकि अभी इस प्रस्ताव का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया गया है। इसके अनुसार प्रस्ताव के तहत अगर अमरीका ने अनुमति दी तो भारत को यह अधिकार होगा कि वह पाकिस्तान को कलपुर्ज़ों आदि की आपूर्ति रोक दे। पाकिस्तान अपनी हवाई सुरक्षा या हवाई बेड़े के लिए दशकों से मुख्य रूप से एफ-16 लड़ाकू विमानों पर निर्भर रहा है।

लाकहीड माट्रिन एयरोनोटिक्स में व्यापार विकास निदेशक अभय प्रांजपे ने कंपनी के एफ-16 संबंधी प्रस्ताव के बारे में एक साक्षात्कार में कहा,’हो सकता है कि कुछ कलपुर्जे़ के केवल भारत में ही बनें।’

क्या समझौते के तहत पाकिस्तान को एफ-16 लड़ाकू विमान या उसके कलपुर्जे़ मिलते रहें? यह पूछे जाने पर प्रांजपे ने कहा कि विदेशी सैन्य बिक्री नीतियों से जुड़े सवाल तो अमरीकी सरकार को ही भेजे जाने चाहिए। वहीं अमरीकी रक्षा विभाग के प्रवक्ता रोजर केबिनेस ने एफ-16 कलपुर्जों की बिक्री से जुड़े सवाल लाकहीड के पास भेज दिए।

रपट के अनुसार रणनीतिक तत्व एक महत्वपूर्ण बिक्री बिंदु है क्योंकि लाकहीड मार्टिन भारत सरकार से एक ऐसा ठेका हासिल करना चाहती है जो कि 100 लड़ाकू विमानों से भी बड़ा हो सकता है। मोदी सरकार सशस्त्र सेनाओं पर 150 अरब डालर खर्च करने की योजना लेकर चल रही है और मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत रोजगार सृजन बड़ा पहलू है। अगर यह सौदा मिल जाता है तो यह एफ-16 के लिए बड़ी बात होगी जो कि एफ-35 का पुराना संस्करण है और इससे पाकिस्तान की कीमत पर अमरीका-भारत रक्षा सौदों को नया बल मिलेगा।

ब्लूमबर्ग की पूरी रपट यहाँ पढ़ें।

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Source - एनसी बिपींद्र व इयन मार्लो, ब्लूमबर्ग