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चीन का बिगुल, मौन गुजरात के शेर!

जंग की शुरू हुई उलटी गिनती!  यह बात कही, ऐसा बिगुल गुरूवार को चीन की राजधानी बीजिंग में बजा और भारत में न प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, न रक्षा मंत्री अरूण जेतली, न भारतीय सेना, न विदेश मंत्रालय या न राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल आदि में से किसी के मुंह से दुनिया ने यह जवाब सुना कि हमने चूड़िया नहीं पहनी है। हमारी भी पूरी तैयारियां हैं। आप भी सोचे क्या ऐसा नहीं होना चाहिए?  आए दिन दुनिया के आगे चीन हमें धमका रहा है। उसका विदेश मंत्रालय, उसकी सेना दुनिया को कह रही है कि भारत झूठा है। उसने चीन की जमीन पर कब्जा किया है। वह अपने सैनिक हटाएं नहीं तो लड़ाई होगी। उसने पड़ौसी देशों की राजधानियों में लॉबिग कर डाली।

नेपाल से बयान दिलवा दिया कि वह लड़ाई में तटस्थ रहेगा। मंगलवार को चीन के विदेश मंत्रालय के सीमा वार्ताकार ने यहां तक कहा कि भूटान ने डोकलाम पठार पर अपना दांवा छोड दिया है। मतलब उसने मान लिया कि वह चीन का है। मगर इन पंक्तियों के लिखने तक इस दांवे को खारिज करने का भूटान सरकार की तरफ से बयान नहीं आया है। क्या भूटान भी कन्नी काट रहा है? तब तो हम अकेले, झूठे हो गए?  यह सब क्योंकर?  भारत जब भूटान की जमीन, उसकी सार्वभौमता की रक्षा के लिए, साथ में अपनी सुरक्षा चिंता में डोकलाम पर चीन को सड़क नहीं बनाने देने के निश्चय पर कायम है तो थिंपू में मौन क्यों?  क्या यह चालबाजी वाली वह कूटनीति तो नहीं कि भूटान खुद मान ले कि डोकलाम पठार चीन का इलाका है। उसे वहां सडक बनाने का हक है। नतीजतन भारत अपने सैनिक हटा ले!

क्या यह जान बचाने के लिए हो रही कूटनीति है? तब फिर गुरूवार को बीजिंग ने क्यों कहा कि लड़ाई शुरू होने की उलटी गिनती शुरू हुई!  मतलब वह भारत को न केवल जलील कर रहा है, झूठा करार दे रहा है, डोकलाम को अपना बनवा दे रहा है बल्कि दुनिया के आगे यह भी जाहिर करवा रहा हैं कि लड़ाई का बिगुल बजते ही डोकलाम का पठार खाली हो गया।

इसलिए उसकी एक-एक बात का जवाब दिया जाना था या चाहिए! ऐसा नहीं है तो कई कारण संभव है। या तो हम डर रहे है या फिर सरकार में सोच है कि गरजने वाले बादल बरसते नहीं। नरेंद्र मोदी- अजित डोभाल ने रणनीति बना रखी हो कि बात नहीं करनी, चुपचाप लड़ाई के लिए मोर्चे पर सेना तैयारी करें और चीन ने लड़ाई ल़डी तो उसे इस बार नानी याद करा देंगे? तीसरा कारण शायद यह सोचना हो कि अपने सैनिकों के सामने जब चीनी सेना बढ़ेगी, दोनों तरफ बंदूके तनेगी तो दुनिया की कूटनीति यथास्थिति बनवा देगी।

मगर कूटनीति के पहलू पर भी चीन दुनिया के आगे भारत का मखौल उड़ा रहा है। गुरूवार को चीन के जिस सरकारी अख़बार ग्लबोल टाइम्स में चीनी सेना की तरफ से युद्व की उलटी गिनती शुरू हो जाने की बात कही गई उसी में उसने वैश्विक समाचार एजेंसी रायटर की उस रपट को फालतू बताया कि दोनों देशों के बीच गोपनीय बातचीत नाकाम हुई है। इस सरकारी अखबार के अनुसार यह फर्जी खबर थी और पूरी तरह अतार्किक। उसने कहा भारत प्रचार कर रहा है कि वह राजनयिक संवाद जारी रखना चाहता है। ऐसा अपनी इमेज बनाने के इरादे से वह कर सकता है। जहां तक चीन के आगे भारत की रणनीतिक प्रतिद्ंवद्ता का सवाल है वह फालतू बात है। वह इसके अयोग्य है। मतलब भारत को चीन प्रतिद्वंदी लायक मानता ही नहीं!

सोचंे, चीन किस अंदाज में दुनिया के आगे भारत को खारिज कर रहा है! और तो और उसने नेपाल को तटस्थ बनवा दिया। भूटान की बोलती बंद हुई पड़ी है और हमसे वह कह रहा है कि सैनिक पीछे हटाओं और जंग की उलटी गिनती शुरू। चीन की सेना पत्रकारों को बुला कर अपनी तैयारियां दिखलाते हुए भारत को धमकी दे रही है। खबरें छपवा रही है कि उसकी सेना आगे की ओर मूव कर गई है। बंकर बना लिए है। ऐसे ही क्या हमारी सेना को मीडिया से नहीं बताना चाहिए कि वह क्या तैयारियां कर रही है? क्या हमें नेपाल, भूटान, श्रीलंका आदि में चीन को जंगखोर, कब्जाखोर प्रमाणित करने का केंपैन नहीं चलाना चाहिए?

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Source - हरि शंकर व्यास, नया इंडिया

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