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राजनीतिक मुख्यधारा में गाय की वापसी

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गोरक्षा इन दिनों बड़ा मुद्दा बन गया है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। भारतीय राजनीति में कई बार गाय व गोरक्षा का मुद्दा, बड़ा मुद्दा बना है। आशुतोष वार्ष्णेय ने इंडियन एक्सप्रेस में इस बारे में एक लेख लिखा है। इसके अनुसार विरोधाभासी स्तर पर ही, गोरक्षा को भाजपा के हिंदू एकता के प्रोजेक्ट के लिए खतरा माना जा रहा है।

उन्होंने लिखा है— कुछ साल पहले मैं एक ऐसे व्यक्ति से मिला जिनका संगठन देश की गलियों में आवारा छोड़ दिए गए पशुओं को बचाने का काम करता है। मैंने उनसे पूछा, ‘सबसे ज्यादा मदद की जरूरत किस पशु को होती?’ मुझे लग रहा था कि वे कुत्तों का नाम लेंगे। लेकिन मुझे पता चला कि गायों की हालत तो इससे भी अधिक खराब है। यानी पशुओं के लिए बने शरण स्थलों आदि में गायों की संख्या कहीं अधिक है। उस व्यक्ति का कहना था,’हम हिंदुओं से उम्मीद की जाती है हम गायों की रक्षा करेंगे… लेकिन होता क्या है जब वे दूध देना बंद कर देती हैं तो हम उन्हें गलियों में खुला छोड़ देते हैं, कचरे और प्लास्टिक आदि के भरोसे।’

उन्होंने लिखा है कि उन्हें यह बात इसलिए याद आ गई क्योंकि गोरक्षा एक बार फिर भारत की मुख्यधारा की राजनीति के केंद्र में है। आमतौर पर हिंदू अधिकारों की सजग राजनीति पर चुप रहने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गोरक्षा दलों की खुले शब्दों में आलोचना करते हुए कहा कि वे रात में कुछ और ‘गोरखधंधे’ करते हैं और दिन में ‘गोरक्षक’ बन जाते हैं। एक तरह से उन्होंने विश्व हिंदू परिषद की नाराज़गी मोल ले ली जिनके सदस्यों ने 2014 के चुनावों में उनके समर्थन में प्रचार अभियान चलाया था।

आलेख के अनुसार गोरक्षा कोई नया राजनीतिक मुद्दा नहीं है। महात्मा गांधी ने अंग्रेजों यानी ब्रितानियों के खिलाफ हिंदू-मुस्लिम मंच तैयार करने के लिए अपने असहयोग आंदोलन में इसे अपनी राजनीति के केंद्र में रखा। उन्होंने ब्रिटेन के खिलाफ शौकत व मोहम्मद अली के अभियान का समर्थन किया। इस पर मुस्लिमों ने गांधी से आग्रह किया था कि अगर वे अली बंधुओं का समर्थन करते हैं तो बदले में मुस्लिम गोवध बंद कर सकते हैं क्योंकि इससे अनेक हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं। इस तरह से ये दोनों समुदाय एक साथ आए और ब्रिटिश शासकों के खिलाफ एक ताकत के रूप में लड़े।

उन्होंने अपने आलेख में सवाल उठाया है कि प्रधानमंत्री मोदी के लिए गोरक्षा की बहस में पड़ने के क्या कारण हैं। गांधी की तरह मोदी का लक्ष्य मुसलमानों के साथ तालमेल बनाना या बैठाना तो कतई नहीं है।

आशुतोष वार्ष्णेय का पूरा आलेख यहाँ पढें।

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Source - आशुतोष वार्ष्णेय, इंडियन एक्सप्रेस