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बस आस्था बनाए रखें…

160130162718_haji_ali_dargah_640x360_epa_nocreditयोजना आयोग की पूर्व सदस्य सईदा हमीद का कहना है कि इस्लाम धार्मिक स्थलों पर अनुमति में किसी तरह का भेदभाव नहीं करता। फिर भी हाजी अली दरगाह में मुस्लिम महिलाओं के प्रवेश के अधिकार के बारे में बंबई उच्च न्यायालय का हाल ही के फैसले में संविधान के इस्तेमाल का मजबूर होना पड़ा है।

योजना आयोग की पूर्व सदस्य व सामाजिक कार्यकर्ता सईदा हमीद ने इंडियन एक्सप्रेस में लेख में लिखा है कि वे इस बात से काफी दुखी हैं कि उनके धर्म इस्लाम की सच्ची भावना की दुनिया में अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है। उन्होंने लिखा है,’मुंबई उच्च न्यायालय ने हाजी अली दरगाह, मुंबई में मुस्लिम महिलाओं के प्रवेश के अधिकार को उचित ठहराया है और अदालत का यह फैसला हम मुसलमानों के मुंह पर तमाचा है कि हम ऐसे धर्म के लिए आवाज नहीं उठा रहे जो कि 1400 साल पहले अपनी स्थापना के समय से ही महिलाओं के अधिकारों के लिए खड़ा है।  और आवाज उठाने के लिए भारतीय मुस्लिम महिला आंदोनलन, BMMA को शाबाशी।’

मुहम्मद साहब के जीवन में महिलाएँ मदीना में इस्लाम की पहली मस्जिद में बिना किसी रोक-टोक के, पूरी स्वतंत्रता से प्रवेश करती थीं। वे केवल मस्जिद में प्रवेश ही नहीं करती थीं बल्कि मुहम्मद साहब से प्रकटीकरण आदि के बारे में अपने संशयों को दूर करने के लिए सवाल भी करती थीं। मुहम्मद साहब की पत्नी उम सलमा के बारे में हदीस की जानकारी सभी को है। उन्होंने पूछा,’हे अल्लाह के पैगंबर, कुरान के सभी प्रकटीकरण पुरुषों से ही संबंधित क्यों हैं? हम महिलाओं के बारे में क्या?’ इसके बाद ही कुरान के शूरा 4 का खुलासा हुआ जिसे शूर-अल-निसा कहा जाता है। यानी ‘महिला’।

सईदा हमीद ने लिखा है कि हदीस दो बिंदुओं की पुष्टि करती है। एक, महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश तथा पैगंबर से विचार विमर्श की आजादी थी। दूसरा, उनकी वैध चिंताओं के बारे में कुरान की एक पूरी शूरा है जो कि दूसरी सबसे बड़ी शूरा है और यह महिला अधिकारों की अपनी तरह की सबसे विस्तृत व्याख्या है।

बंबई उच्च न्यायालय के फैसले में BMMA की जीत हुई है। इससे व्यवहार एक तरह से मूल भावना के करीब आया है। मेरी पीड़ा यह है कि दरगाह में प्रवेश की अनुमति देने के लिए अदालत को संविधान व कानून की दलील देनी पड़ी है जबकि इस्लाम पूजा के सभी स्थलों को केवल महिलाओं ही नहीं बल्कि सभी धर्मावलंबियों के लिए खोलता है। मेरी राय में दरगाह ट्रस्ट अब जो सबसे खराब कदम उठा सकता है वह है इस फैसले के खिलाफ अपील करना।

सईदा हमीदा का पूरा लेख यहाँ पढ़ें।

 

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Source - सईदा हमीद, इंडियन एक्सप्रेस