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कश्मीर का हल चाहते हैं तो पहले पत्थर त्याग दें!

Indian government forces chase Kashmiri protesters during a protest after curfew was lifted in some parts of Srinagar, Indian-controlled Kashmir, Monday, Aug. 29, 2016. Authorities on Monday lifted a curfew imposed in most parts of Indian-controlled Kashmir as part of a 52-day security lockdown, although most shops and businesses remained closed due to an ongoing strike called to protest Indian rule in the disputed Himalayan region. (AP Photo/Mukhtar Khan)

कश्मीर घाटी में लगभग 50 दिनों से जारी ताजा हिंसा व तनाव के बीच चिंतक राजमोहन गांधी का मानना है कि कश्मीरी लोगों को पत्थर त्यागने होंगे और नया तरीका खोजना होगा जो कि कट्टरवादी इस्लाम व हिंसा से मुक्त हो।

महात्मा गांधी के पोते राजमोहन गांधी ने इंडियन एक्सप्रेस में अपने एक लेख में यह सुझाव दिया है।

उन्होंने लिखा है-कश्मीर के बारे में ये निम्न बयान किसी एक या दूसरे पक्ष को कष्ट दे सकते हैं लेकिन मेरा मानना है कि वे निर्विवाद हैं। पहला यह है कि कश्मीर में भारत का शासन, कश्मीर की प्रदर्शित इच्छा वाला या शासन की सहमति पर आधारित नहीं है। दूसरा, कश्मीरियों प्रदर्शनकारियों की मौतों व उनकी आंखों को चोट पहुंचने की घटनाओं से दुनिया भर में भारत की छवि प्रभावित हुई है। तीसरा, भारतीय जनता कम से कम निकट भविष्य में तो कश्मीर को अलग होने की अनुमति नहीं देगी। अगर नयी दिल्ली की सरकार ऐसे किसी विचार पर विचार करने को तैयार हो, भारतीय जनता उसे ऐसा नहीं करने देगी।

चौथा, इस सारे विवाद का केंद्र कश्मीर घाटी है। जम्मू व लद्दाख की अधिकांश जनता भारत से विमुख नहीं है। पांचवां, दुनिया में कहीं भी परम आत्मनिर्णय जैसी कोई चीज नहीं है। यहां तक कि बड़े बड़े देश भी वह सब नहीं कर पाते जो वे चाहते हैं। आजाद कश्मीर नाम की कल्पना तो की जा सकती है लेकिन तथ्यात्मक रूप से कश्मीर आजाद नहीं है। व्यावहारिक रूप से कश्मीर भारत व पाकिस्तान की उपेक्षा नहीं कर सकता।

छठा, पाकिस्तान का कश्मीर पर दावा यहां की मुस्लिम बहुलता के कारण है और कश्मीर की मुस्लिम बहुलता ही भारत के इससे जुड़ाव की प्रमुख वजह है। 1940 के दशक में जब शेख अब्दुला की अगुवाई में कश्मीरियों ने पाकिस्तान से हमले का विरोध किया और भारत में शामिल होने को आतुर दिखे तो उनका स्वागत दो देशों के सिद्धांत के विरोध के रूप में किया गया।

इस बयान में एक अपवाद भी है। भारत में अनेक लोग कश्मीर की जमीन तो चाहते हैं लेकिन उनकी वहां की जनता के प्रति कोई भावना नहीं है। वहां की बहुसंख्यक मुस्लिम जनता से किसी तरह का लगाव नहीं है। सातवां, कट्टरपंथी इस्लाम के कारण कश्मीरी अलगाव पैदा नहीं हुआ बल्कि यह तो उसका दोहन करने की फिराक में है। मानवाधिकार को लेकर चिंतित लोगों सहित सभी कश्मीरियों को इसे मानना चाहिए और खुद को इसके लिए तैयार करना चाहिए।

राजमोहन गाँधी का पूरा विश्लेषण यहाँ पढ़ें।

 

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Source - राजमोहन गांधी, इंडियन एक्सप्रेस