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भाड़े के लड़ाकों की विरासत

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पाकिस्तान ने अपने ‘हथियारबंद आतंकियों’ से छुटकारा पाने का प्रण लिया है लेकिन वे इतनी आसानी से हार नहीं मानेंगे। न्यूजवीक पाकिस्तान के सलाहकार संपादक के खालिद अहमद ने इस मुद्दे पर इंडियन एक्सप्रेस में एक आलेख लिखा है।

इसमें उन्होंने सवाल उठाया है कि पाकिस्तान ने अपनी राष्ट्रीय कार्ययोजना, NAP में अपने ‘हथियारबंद लड़ाकों’ को खात्मा करने का प्रण क्यों लिया? पिछले साल दिसंबर में निर्वासित पाकिस्तानी लड़ाके मुल्ला फ़ज़लुल्लाह ने पेशावर में आर्मी पब्लिक स्कूल में 132 बच्चों की हत्या कर दी। यह काम उसके गुर्गों ने किया। इस घटना ने देश दुनिया को स्तब्ध कर दिया। प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने सर्वदलीय बैठक बुलाई और सभी को घरेलू आतंकवाद के खिलाफ NAP के लिए राजी कर लिया।

उन्होंने लिखा है कि बीते आठ महीनों में पाकिस्तान ने आतंकवाद की लहर को एक तरह से थाम लिया है और इसमें NAP की बड़ी भूमिका है जिसने सेना को हस्तक्षेप की अनुमति दी। NAP ‘हथियारबंद आतंकियों’ से छुटकारा पाने की आज्ञा या अनुमति देता है।

हालांकि उन्होंने यह भी लिखा है कि पाकिस्तान का घरेलू आतंकवाद कोई खत्म नहीं हो गया है। नौ अगस्त को ही एक आत्मघाती हमलावर ने क्वेटा में 70 से अधिक लोगों की जान ले ली। इनमें से ज्यादातर वकील थे जो कि वहां भर्ती अपने एक नेता से मिलने आए थे। आईएस तथा जमातुल अहरार, दो आतंकवादी संगठनों ने इसकी जिम्मेदारी ली लेकिन प्रधानमंत्री शरीफ का मानना है कि यह उन ‘तत्वों का काम हो सकता है जो कि पाकिस्तान में चीन आर्थिक गलियारे’ के निर्माण का विरोध कर रहे हैं। वहीं सेना प्रमुख रहील शरीफ सोचते हैं कि इसमें उन तत्वों का हाथ हो सकता है जो कि तालिबान के खिलाफ सेना के मौजूदा अभियान से नाखुश हैं।

पाकिस्तान को यह महसूस हो रहा है कि ‘अस्वीकरणीय युद्धों’ का उसका अतीत उसके साथ चल रहा है। दुनिया अब चाहती है कि पाकिस्तान अपने लड़ाकों से छुटकारा पाये। पाकिस्तान पर आरोप है कि उसने अपनी जमीन पर ऐसी पनाहगाहों की अनुमति दी जिनका सीमापारीय तबाही में हाथ रहा। पाकिस्तान को भी कीमत चुकानी पड़ी लेकिन उसने अपनी सोच बदलने में समय लगाया। लेकिन अंतत: उसने पुराने प्रतिमानों को बदला और नये सेना प्रमुख की अगुवाई में सफाई अभियान ‘जर्ब ए अज्ब’ चलाया। आतंकवादी अब निर्दोष पाकिस्तानियों को निशाना बनाकर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं।

ख़ालिद अहमद का पूरा लेख यहाँ पढ़ें।

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Source - खालिद अहमद, इंडियन एक्सप्रेस

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7 September 2016