दो ओलंपिक संस्कृतियाँ – हिजाब और बिकिनी

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रियो में चल रहे ओलंपिक के दौरान बहुत से रंग देखने को मिल रहे हैं इस दौरान एक तस्वीर सामने आई है जिसमें बीच वॉलीबॉल खेलते हुए नेट के एक तरफ 19 साल की दोआ एलगोबशी है जो मिस्र की हैं जबकि दूसरी तरफ जर्मनी की कीरा वॉकनहॉस्ट हैं दोनों के हाथों के दरम्यां महज़ एक गेंद का फासला है लेकिन तस्वीर बहुत कुछ बयां कर रही है दोआ सिर पर हिजाब से लेकर पैरों तक ढकी है जबकि कीरा महज बिकनी में है। दो अलग लड़कियां, दो अलग मज़हब, दो अलग तहज़ीब, दो अलग संस्कृतियों को खेल ने एक साथ ला खड़ा किया है । किसी भी क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका, उनके साथ किया जा रहे सलूक, उनकी महत्वकांक्षा को कितनी तवज्जो दी जा रही है बहुत मायने रखता है और ये तस्वीर कुछ ऐसी ही कहानी बयां कर रही है। इन दोनों लड़कियों की पोशाक पर छात्रा खदीजा बुईज़ और पूर्व अभिनेत्री नोर्मा मोर से चर्चा की गई तो कहानी और दिलचस्प हो गई

खदीजा बुईज़

खदीजा ने बताया की उसकी मां मिस्र की थी जबकि पिता डच थे। वो महज़ चार साल की थी तो दोनों में अलहदगी हो गई खदीजा नेदरलैंड्स में बड़ी हुई पश्चिमी माहौल में खदीजा ने 19 साल की उम्र में इस्लाम की राह पर चलना शुरू किया मां के लाख रोकने के बावजूद खदीजा ने हिजाब पहना और इस्लाम के हिसाब से ज़िन्दगी को ढालना शुरू कर दिया कर दिया, यूरोप के बदलते हालात के बीच खदीजा को कई बार कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। कभी भरे रेस्टोरेंट में उसका हिजाब खींचा गया तो कभी हिजाब नौकरी ना मिलने का सबब बन गया, फ्रांस में हुए हमले के बाद तो हालात और बद से बदतर हो गए..एक वक़्त ऐसा आया जब खदीजा पर हिजाब छोड़ने का दबाव बनाया गया पर खदीजा ने मरते दम तक हिजाब ना छोड़ने की बात कही लेकिन बदलते दौर में इस्लाम को जब IS  के साथ जोड़ा गया तो खदीजा ने कहा आज के युवा की तस्वीर IS नहीं बल्कि दोआ एलगोबशी है ।

नोर्मा मोर

वहीं दूसरी तरफ नोर्मा मोरा की दलील कुछ अलग है वो खुद को एक ऐसे इंसान के तौर पर पेश करती हैं जिसे खुदा का डर है लेकिन वो दिखावे में यकीन नहीं करती वे बताती हैं की एक बार वे ईरान दौरे पर गई थीं यहां उन्हें महसूस हुआ की गर्म मौसम में हिजाब पहनना कितना मुश्किल है और महज़ महिला होने के नाते वे इस तरह से खुद को सज़ा नहीं दे सकतीं

दोआ और कीरा की तस्वीर एक आस जगाती है। दोनों के हाथों के बीच की कुछ दूरी पश्चिम और पूर्व में औरतों की छवि के बारीक अंतर को पेश कर रही है जिसे दुनिया को समझना होगा और उनका सम्मान करना होगा।

रोजर कोहेन का पूरा लेख आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

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Source - रोजर कोहेन, न्यू यॉर्क टाइम्स