ओलंपिक में भारत: पीड़ा और परमानंद!

ओलंपिक दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित खेल आयोजन है। इसमें पदक जीतने का मतलब उस खेल में अपनी श्रेष्ठता साबित करना होता है। हर देश चाहता है कि उसके खिलाड़ी ओलंपिक में पदक जीतें, ज्यादा से ज्यादा जीतें। क्योंकि एक तरह से किसी देश की ताकत और सामाजिक दर्जे का आकलन ओलंपिक पदक तालिका में उसकी जगह को देखकर भी लगाया जाता है। यहीं भारत मात खा रहा है। ओलंपिक खेलों में उसका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है। व्यक्तिगत से लेकर टीम स्पर्धाओं तक में उसके खिलाड़ी पदक नहीं जीत पा रहे। लेकिन क्या किसी खिलाड़ी के प्रयासों, मेहनत व लगन का आकलन केवल इस बात से होना चाहिए कि उसने ओलंपिक में स्वर्ण, रजत या कांस्य पदक जीता या नहीं? वरिष्ठ लेखक, पत्रकार अमिताव कुमार इससे सहमत नहीं हैं।

09-1

अमिताव कुमार का मानना है कि किसी खिलाड़ी की मेहनत या लगन का आकने का पैमाना ओलंपिक में सिर्फ शीर्ष तीन पदक हासिल करना नहीं हो सकता। उसके प्रदर्शन का आकलन करने लिए उसकी पृष्ठभूमि, खेल का इतिहास व देश में उपलब्ध सुविधाओं को भी देखा जाना चाहिए।

अमिताव कुमार ने इलस्ट्रेटेड वीकली आफ इंडिया के 22 अगस्त 1976 अंक का जिक्र किया है जो कि मांट्रियल ओलंपिक के तुरंत बाद प्रकाशित हुआ था। इसमें शीर्षक था ’60 करोड़ भारतीय—एक कांस्य तक नहीं’। दरअसल मांट्रियल ओलंपिक में भारत को एक भी पदक नहीं मिला। पुरुष हाकी टीम 1924 के बाद पहली बार ओलंपिक से बिना पदक लौटी। यहां अमिताव का कहना है कि बाकी दुनिया के लिए जहां ओलंपिक खेल, खेलों के जरिए यशस्वी उपलब्धियों का प्रतिनिधित्व करते हैं वहीं भारत के ज्यादातर शहरी, शिक्षित, मध्यमवर्गीय लोगों के लिए तो यह जैसे हारने का, विफलता को महसूस करने का पारंपरिक मंच है।

और यह जो हार, पराजय या विफलता की जो यह अनुभूति भारतीयों को मिलती है वह दुनिया को आंखों पर पट्टी बांधकर देखने के कारण है। जो लोग यह अपमान महसूस करते हैं वे उस वर्ग से हैं जिसे हम संभ्रात मानते हैं या जो लोग फुर्सत में हैं। वहीं मैदान में पसीना बहाने वाले ज्यादातर एथलीट समाज के गरीब गुरबा तबके से आते हैं। तो ये जो संभ्रात तबका है वह बाद वाले लोगों की जीत का उत्सव मनाना तो दूर उसमें शामिल भी नहीं होना चाहता।

यहां अमिताव कुमार ने लिखा है कि भारतीय एथलीटों ने सालों साल तक ओलंपिक में भले ही कोई मेडल नहीं जीता हो लेकिन उन्होंने अनेक उल्लेखनीय उपलब्धियां दर्ज की हैं। यहां उन्होंने 1976 ओलंपिक की 800 मीटर दौड़ में भारतीय धावक श्रीराम सिंह का जिक्र किया है। वे भले ही पदक नहीं जीत पाए लेकिन एशियाई खेलों के अपने ही रिकार्ड को तोड़ा। उन्होंने अपनी दौड़ की शुरुआती इतनी तेजी से की कि क्यूबा के धावक अलबर्तो जुआनतोरेना ने बाद में कहा कि उनसे ही उन्हें स्वर्ण पदक जीतने की प्रेरणा मिली। यहां याद रहे कि भारत में में 1982 सिंथेटिक ट्रेक तक नहीं था।

अमिताव कुमार ने अपने आलेख में एथलीटों सुविधाओं, प्रशिक्षण, सामाजिक व आर्थिक पृष्ठभूमि में अंतर को भी रेखांकित किया है। 2012 लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली मेरी कॉम एक काश्तकार की बेटी हैं। इसी रियो ओलंपिक में बहुत अच्छा प्रदर्शन करने वाली तीरंदाज दीपिका कुमार रांची के पास के एक गांव की है और उनके पिता आटो रिक्शा चलाते हैं। दुत्तीचंद को ही लें, 100 मीटर फर्राटा दौड़ के लिए क्वालीफाई करने वाली वे केवल तीसरी भारतीय धावक हैं। उन्हें तो भरोसा भी नहीं था कि रियो में दौड़ के लिए उनके पास स्पाइक्स होंगी।

अमिताव कुमार का पूरा आलेख यहां पढ़ें

Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और ट्विटरपर फॉलो करे! हर पल अपडेट रहने के लिए डाउनलोड करें Hindi News App

Source - अमिताव कुमार, न्यूयार्कर