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‘आप भले न बनें भारत के चौधरी, पर उन्हें कश्मीर का न बनने दें।’

Shah Faesel - Kashmir

प्रिय शाह फ़ैसल,

सबसे पहले तो मैं यह बता दूँ कि मैं आपका प्रशसंक हूँ। आपके सोच की स्पष्टता का और जिस आसानी, ईमानदारी, सहजता और साफगोई के साथ आप उसको व्यक्त कर पाते हैं। सबसे पहले आप सुर्खियों में तब आए जब आपने आईएएस की परीक्षा में टॉप किया। किसी भी कश्मीरी ने यह मुकाम आपसे पहले हासिल नहीं किया था। फिर मैंने अखबारों में आपके लेख पढे़ और टेलीविजन चैनलों में होने वाली डिबेट में आपको सुना।

जिस खुलेपन और बेबाकी से आप अपनी राय व्यक्त करते हैं उसने मेरी नजरों में आपका सम्मान और बढ़ाया। साथ ही इस बात पर भी ध्यान गया कि आमतौर पर सरकारी नौकरी कर रहे, खासकर आईएएस की नौकरी, वाले लोगों में इस तरह की बेबाकी कम ही दिखती है। लेकिन हाल में टेलीविजन चैनल्स को खरी-खरी सुनाते हुए जो फेसबुक पोस्ट आपने लिखी है उसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया है। फेसबुक पोस्ट में कुछ बातें ऐसी हैं जिनसे मैं सहमत हूँ,  कुछ से मैं कुछ हैरत में हूँ और कुछ से मैं काफी दुखी व आहत हूँ। इन परस्पर विरोधी भावों के बीच जो मेरी मनोस्थिति है उसी को इस खुले खत के ज़रिए मैं व्यक्त कर रहा हूँ और जो मुददे आपने उठाए हैं उनमें से कुछ पर बिंदुवार मैं अपनी टिप्पणी कर रहा हूँ। इसे किसी पत्रकार की राय या विश्लेषण की तरह आप मत देखिएगा बल्कि ये सोचिएगा कि ये विचार एक ऐसे व्यक्ति के हैं जिसे आपसे और तमाम नौजवान कश्मीरियों से बहुत उम्मीद है।

मारे गए आतंकवादी कमांडर के साथ मेरी फोटुएँ लगाकर, राष्ट्रीय मीडिया का एक तबका एक बार फिर अपनी उसी परंपरागत बर्बरता पर उतर आया है जो झूठ को कैश कर उसका फ़ायदा उठाती है, लोगों को बाँटती है और अधिक नफ़रत फैलाती है।

सिद्धांतत: मैं आपसे बिलकुल सहमत हूँ। पिछले 20—22 साल से मैं भी लगातार कश्मीर से रिपोर्टिंग करता रहा हूँ और लगातार वहाँ आया हूं। कश्मीर एक पेचीदा मुददा है। कश्मीर को सरलता से समझाने की कोशिश करना या कश्मीर को सिर्फ सफेद और स्याह में बाँटने की कोशिश करना, ये सब वही कर सकता है जो दरअसल कश्मीर को नहीं जानता और समझता है। मैं यह भी मानता हूँ कि बुरहान वानी और आपकी तुलना अनावश्यक है और मौजूदा हालात में तो इसे किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता। मेरे अनुसार तो यह तुलना बचकानी और मूर्खतापूर्ण होने के साथ-साथ घातक भी हो सकती है। इतने आक्रोश भरे माहौल में वानी व आपकी तुलना की वजह से उन लोगों की नज़र में आप जयचंद हो जाएँगे जो बुरहान वानी को अपना पृथ्वीराज चौहान मानते हैं। तो यहाँ आपकी नाराज़गी और आहत होना मेरी समझ में आता है।

इस समय जबकि कश्मीर अपने लोगों की मौत का मातम मना रहा है.. लाल—नीले न्यूजरूमों से एक प्रोपगेंडा चलाया जा रहा है। उकसाने वाला काम किया जा रहा है जिससे कश्मीर में और अलगाव व गुस्से के बीज बोये जा रहे हैं जिसे काबू करना शायद भारत सरकार के लिए मुश्किल हो।

यहाँ भी मैं आपसे सहमत हूँ। मीडिया जानबूझकर यह गलतियाँ नहीं करता। न इसके पीछे ज्यादातर मीडिया का कोई एजेंडा होता है। लेकिन कई बार कम समझ, असंवेदनशीलता और उस पर लोकप्रियता की होड़, इन सब की वजह से ऐसी बातें मीडिया से कई बार हो जाती हैं जो वह न करे तो सही भी हो और बेहतर भी।

व्यक्तिगत ख़तरे की बात छोड़ भी दें तब भी इस बेहूदा बहस का हिस्सा बनकर मैं बहुत आहत हूँ।  मैं आईएएस नौकरी करने के लिए बना था या आपकी परपीड़क प्रोपगेंडा मशीन का हिस्सा बनने के लिए? जब मैंने आईएएस की परीक्षा उत्तीर्ण की तो कभी यह नहीं सोचा था कि बची हुई उम्र किसी सरकारी मेज के पीछे बैठ उसे खुरचने में निकल जाएगी। और इस तरह की बेहूदा बातें जारी रहीं तो मैं त्यागपत्र देना पसंद करूँगा।

अब ये जो टिप्पणी है आपकी उससे मैं काफी परेशान हूँ। क्या आप सचमुच ऐसा सोच रहे हैं? अपना समय सरकारी टेबल खुरचने में निकाल रहे हैं? और अगर यह बकवास आपके चारों तरफ़ रहती है तो क्या आप सचमुच इस्तीफा देने पर विचार कर रहे हैं?

बहुत मन से यह उम्मीद कर रहा हूं कि आप सचमुच ऐसा नहीं सोच रहे होंगे। ये बात आपने आवेश में या फिर कुछ नहीं कर पाने की कुंठा में लिख दी होगी। मैं समझ सकता हूँ। हम सबके साथ कई बार ऐसा होता है। और फिर आपके चारों तरफ तो हिंसा व मौत का तांडव चल रहा है। ये भी साफ़ दिख रहा है कि आगे की राह भी जटिल है। कश्मीर का कोई आसान हल नहीं है।

लेकिन मैं आपको याद दिलाना चाहता हूँ कि कुछ साल पहले जब आपने आईएएस की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया तो टाइम्स आफ इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में आपने गांधी जी को अपना आदर्श बताया था और कहा था कि कश्मीर को गांधीगीरी की जरूरत है। साथ ही आपने यह भी कहा था कि भारत को बहस करने वाले ऐसे ‘आर्ग्यूमेंटेटिव इंडियंस’ की जरूरत है जिनका जिक्र अमर्त्य सेन ने अपनी किताब में किया था।

उसी इंटरव्यू में आपने कहा था कि आईएएस के नतीजों ने व्यवस्था में आपका विश्वास स्थापित किया है और आप यह मानते हैं कि भारत में मेरिट का सम्मान किया जाता है। आपने यह भी कहा था कि किस तरह से आपकी आईएएस में सफलता उन सब लोगों की नाक पर एक तगड़ा घूँसा है जो यह मानते हैं कि कश्मीर में सिर्फ आतंकवादी ही पैदा हो सकते हैं।

 

फैसल साहब, सिर्फ पांच साल में आपके अंदर धधकती हुई वह ज्वाला कहाँ विलुप्त हो गई है। मुक्केबाजी के इस रिंग में आपको अभी टिके रहना है। इस विश्वास के साथ कि एक दिन आप उन सब लोगों को धराशायी कर देंगे जो कश्मीर के स्टीरियोटाइप्स और गलत तुलनाओं के घेरे से न तो कभी बाहर निकलते हैं और न निकलना चाहते हैं। आपको तब भी ऐसे लोगों से आपत्ति थी और मुझे विश्वास है कि आज भी है।

कोई भी सरकार अपने लोगों को चोट नहीं पहुँचाना चाहेगी और जब कोई सरकार अपने ही नागरिकों को मारती है या अपंग बनाती है तो यह खुद को चोट व नुकसान पहुँचाने जैसा है, जैसे स्वयं का ही नाश कर रही हो। आज कश्मीर की राजनीति रक्तरंजित है। कोई भी सरकार अपने लोगों के दर्द से खुद को अलग नहीं कर सकती और इस संकट से पार पाने तथा युवाओं तक पहुँचने के सारे प्रयास किए जा रहे हैं। इसमें समय लगेगा।  चलिए उनके लिए दुआ करते हैं जिन्होंने कश्मीर में मौजूदा संकट में अपनी जान गँवा दी या आंखों की रोशनी खो दी। परीक्षा की इस घड़ी में हम एक दूसरे के साथ हैं।

आपकी इस बात से मैं बहुत दुखी हूँ। क्षुब्ध हूँ। आप एक आईएएस अफसर हैं और भारत व भारतीय संविधान के प्रतिनिधि हैं। अगर मैं उदारवादी बनूँ तो आपकी इस भाषा में मुझे दुख, दर्द व हताशा नजर आती है। लेकिन अगर मैं थोड़ा सरकारी नजरिया अपनाऊँ तो इसमें मुझे अनुशासनहीनता के साथ-साथ कुछ बगावत भी नज़र आ सकती है। जब आपके चारों तरफ निर्दोष लोग मर रहे हों और घायल हो रहे हों तो मुझे उनके लिए आपका दर्द और उनके प्रति आपकी संवेदना समझ में आती है। मुझे भी वह दर्द है। लेकिन क्या हमें उन सुरक्षाकर्मियों के लिए भी उतना ही संवेदनशील नहीं होना चाहिए जिनके परिवार वालों तक को आतंकवादी नहीं बख्शते। ये सुरक्षाकर्मी देश की सेवा करते हुए अपना सबकुछ बलिदान कर देते हैं। उस देश की सेवा करते हुए जिसकी आप भी नौकरी कर रहे हैं बतौर एक आईएएस।

मैं समझ सकता हूं कि जिस दबाव में व तनाव में आप हैं उसको झेल पाना आसान नहीं है। इस विरोधाभास में अच्छे-अच्छे टूट सकते हैं। लेकिन आपसे हमें ज्यादा शक्ति, संयंम और दृढ़ता की अपेक्षा है। मैं आपको याद दिलाना चाहूंगा कि कैसे मार्च 2012 में आपने द कश्मीरवाला में एक गुमनाम लेकिन वाकपटु पोस्ट का जवाब दिया था। उन गुमनाम पोस्ट में आप पर खासे तंज़ किए गए थे और आपको हेमलेट यानी दगाबाज़ करार दिया गया था।

आपका जवाब बेहतरीन था। सिर्फ इमोशनल स्तर पर ही नहीं आपका उत्तर तर्कों की मजबूत नींव पर काबिज़ था। आपने लिखा था कि “अमरीका या दिल्ली बैठ कश्मीर मुददे को रोमांटिसाइज़ करना बड़ा आसान है लेकिन ज़मीन पर काम करने के लिए कोई तैयार नहीं है। मैं अपने लोगों के साथ हूँ उनके लिए काम कर रहा हूँ और उनका दुख-सुख बाँट रहा हूँ। मेरी नौकरी मुझे यह सौभाग्य देती है। न मैं इसे समर्पण की तरह देखता हूँ न समझौते की तरह। मैंने हमेशा सच बोला है और बोलता रहूँगा। चाहे मुझे कोई भी त्याग करना पड़े। आप लोगों को कुछ वक्त लगेगा यह समझने के लिए कि मैं किन सिद्धांतों पर जी रहा हूँ। जब तक आप यह नहीं समझते, बेहतर होगा कि हम चुप रहें और एक दूसरे पर इल्जाम लगाना बंद करें।

मैं भारत का चौधरी नहीं हूं और न ही आप कश्मीर का चौधरी बनने की कोशिश करें। कहानी अभी बाकी है। वक्त बताएगा कि कौन धोखेबाज़ था और कौन नहीं।

प्रिय फैसल, क्या जज्बा और जोश था आपके जवाब में। अजब उर्जा थी। पढ़कर रोंगटे खड़े हो गए थे। लेकिन आज आपकी भाषा में मुझे हताशा नज़र आई। ऐसा नहीं होने दें। हिम्मत रखें। निडर रहें। इस निराशा और नाउम्मीदी के लबादे को उतार कर फेंके जो शायद मौजूदा माहौल में आपको घेरने की कोशिश कर रहा है। हमें आपकी ज़रूरत है। कश्मीर को आपकी ज़रूरत है। हम नहीं चाहते कि आप हमारे, भारत के, चौधरी बनें। लेकिन उन लोगों को कश्मीर का चौधरी नहीं बनने दें।

आपसे उम्मीद लगाए,
संजीव श्रीवास्तव

(संजीव श्रीवास्तव, एडिटप्लेटर के संस्थापक और संपादक हैं। वे बीबीसी भारत के पूर्व संपादक रहे हैं। )

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