प्रवासी मजदूरों के लिए भी हो कोई ओपेक

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दुनिया में प्रवासी मजदूरों की एक बड़ी संख्या है। विशेषकर खाड़ी और तेल उत्पादक अन्य देशों में। लेकिन मजदूरों के हितों की बात करने वाला कोई संगठन नहीं है विशेषकर कोई सामूहिक मंच नहीं है। इनसीड में नवोन्मेष एवं नीति पहल के निदेशक सैमी माहरूम ने इसी मुद्दे को उठाते हुए प्रोजेक्ट सिंडीकैट में एक लेख लिखा है।

इसमें उन्होंने लिखा है कि सितंबर 1960 में ईरान, इराक, कुवैत, सउदी अरब व वेनेजुएला की बैठक बगदाद में हुई और तेल निर्यातक देशों का संगठन, ओपेक सामने आया। लेख के अनुसार जैसे जैसे दुनिया की तेल यानी पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भरता बढ़ी वैसे वैसे ओपेक की ताकत भी। यानी ओपेक ज्यादा से ज्यादा ताकतवर होता गया।

इसके अनुसार आज अनेक विकासशील देश दुनिया के कुछ प्रमुख श्रमबल या श्रमिक निर्यातक देश बन गए हैं। इनमें पश्चिम एशिया के अनेक देश भी शामिल हैं। तो क्या यह उचित समय नहीं है कि ओपेक की तर्ज पर प्रवासी श्रमिकों के लिए भी कोई बड़ा व प्रभावी संगठन बने। इस बारे में सोचा जाए और काम हो।

लेख के अनुसार ओपेक अपने सदस्यों के साझा हितों की रक्षा करने में सफल रहा है। ये देश व्यक्तिगत स्तर पर या अकेले शायद ऐसा नहीं कर पाते। इसके अनुसार जब बाजार में ढांचागत विकृतियां हों तो ओपेक जैसे राजनीतिक टूल तथा सामूहिक कार्रवाइयाँ किसी सार्वजनिक नीति से अधिक प्रभावी हो सकती हैं।

उन्होंने लिखा है कि आज श्रम निर्यातक देश 1960 में ओपेक के संस्थापक सदस्य देशों से ज्यादा अलग नहीं हैं। ये देश भी बाजार से प्रभावित होने का जोखिम झोल रहे हैं। धनी श्रम आयातक देशों व गरीब श्रम निर्यातक देशों के बीच का संबंध साझी निर्भरता वाली रिश्तेदारी जैसा है; लेकिन श्रम आयातक देश आप्रवासन या श्रम बाजार से जुड़े नियमों को अपनी मर्जी से बदलते रहते हैं, उनमें ढील देते हैं या कड़ा करते हैं। इससे निर्यातक देश हमेशा अनिश्चितता की स्थिति में रहते हैं।

प्रवासी श्रमिकों पर पूरा लेख यहाँ पढ़ें।

 

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Source - सैमी माहरूम, प्रोजेक्ट सिंडीकैट