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तटस्थ मध्यस्थ की नियुक्ति से ही खुलेगी निष्पक्षता की राह

उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के मुद्दे पर चल रही खींचतान से जहां न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, वहीं मध्यस्थता के क्षेत्र में प्रभुत्व के लिए चल रहा संघर्ष उतना स्पष्ट नहीं दिख रहा है। सरकार, सार्वजनिक उद्यम और उनकी सहयोगी कंपनियां देश में ठेके देने के सबसे बड़े स्रोत हैं। बड़ी परियोजनाओं के निर्माण का ठेका निजी फर्मों को देने का अधिकार होने से सरकार और उपक्रमों को अनुबंध में बेहतर स्थिति हासिल होती है। अक्सर इनकी तरफ से निजी फर्मों को जिस अनुबंध की पेशकश की जाती है उसमें एकतरफा प्रावधान होते हैं। इनमें सबसे ज्यादा विवाद सरकार या उपक्रमों के ही शीर्ष अधिकारियों या उससे संबंधित व्यक्तियों को मध्यस्थ नियुक्त करने को लेकर खड़ा होता है।

उच्चतम न्यायालय ने अतीत के अपने कई फैसलों में उपक्रमों की इस प्रवृत्ति की आलोचना की है और उन्हें विरोधी पक्ष के लिए भी बराबरी का मौका देने को कहा है। हालांकि न्यायालय की इन टिप्पणियों को काफी हद तक नजरअंदाज ही किया जाता रहा है। इस समस्या को दूर करने के लिए विधि आयोग की 246वीं रिपोर्ट की अनुशंसाओं के अनुरूप मध्यस्थता एवं मेलमिलाप अधिनियम को दो साल पहले संशोधित किया गया था। इस असमानता को खत्म करने के लिए मध्यस्थों के चयन और उनकी निर्योग्यताओं के संबंध में दिशानिर्देश भी जारी किए गए थे। लेकिन उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के कुछ हालिया फैसलों से पता चलता है कि सार्वजनिक उपक्रम अब भी मध्यस्थता पर कायम अपना वर्चस्व छोडऩे के लिए नहीं तैयार हैं। ये सरकारी कंपनियां अपने ही मामलों में खुद को न्यायाधीश की भूमिका में बनाए रखना चाहती हैं।

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Source - एम जे एंटनी, बिजनेस स्टैंडर्ड

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