रफ़ी के गीतों ने दूर किये फासले

BY Sushant EP Hindi | PUBLISHED: 31 July 2016

 

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आवाज के जादूगर मोहम्मद रफ़ी के गाये हुए एक-एक गाने हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गए. रफ़ी का जन्म अमृतसर के पास कोटला सुलतान सिंह में हुआ था पर रफ़ी बेहतर तालीम के लिए लाहौर गए, जहां उनके पिता सैलून की दुकान थी.

बचपन से ही रफ़ी की संगीत में बहुत रूचि थी जब वो बहुत छोटे थे तब वो अपने पिता के साथ उनकी दुकान पर जाया करते और रोज वहा एक फ़क़ीर आता और वो एक गीत गाता. रफ़ी को फ़क़ीर का वो गीत बहुत भाता और वो उसके पीछे-पीछे चल देते और उसी गीत को गुनगुनाते. फकीर ने उनके गले से निकले गाने को सुनकर उस समय कहा था कि तुम बहुत बड़े फनकार बनोगे,

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समय बीतता गया. रफ़ी गायक बनना चाहते थे पर उनके पिता को ये पसंद नहीं था. पर उनके बड़े भाई मोहमद्दीन ने उनका साथ दिया और संगीत के तालीम के लिए उस्ताद उस्मान खान के पास ले गए. उसके बाद एक दिन लाहौर में केएल सहगल का प्रोग्राम था पर प्रोग्राम से पहले माइक खराब हो गया. माइक ठीक होने तक फीकू यानी रफ़ी को मौका मिला और उन्होंने हजारो श्रोताओ का मन मोह लिया, और सहगल साहब ने शाबासी दी वो अलग. और यहीं से रफ़ी की गाड़ी चल पड़ी, पर मुम्बई अभी भी दूर थी.

लाहौर की गालिया छोड़ रफ़ी मुम्बई पहुंचे और पहला मौका उन्हें संगीतकार श्यामसुंदर ने दिया. पर खर्च के पैसे खत्म होने पर उन्हें लाहौर लौटना पड़ा. लेकिन मुम्बई ने सुरों के इस जादूगर को दोबारा बुलाया फिल्म ‘गांव की गोरी’ में गीत गाने के लिए और इस तरह सन 1945 में रफ़ी हमेशा-हमेशा के लिए मुम्बई के होकर रह गए.

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संगीतकार नौशाद के साथ काम करने की रफ़ी की हसरत थी पर नौशाद उनसे मिलने को तैयार न थे. तब रफ़ी लखनऊ जाकर नौशाद के पिता से सिफारिशी चिट्टी लिखवा कर नौशाद से मिले. नौशाद ने रफ़ी को आजमाने के बाद उन्हें अपने साथ तो रखा पर कोरस टीम में. नौशाद के लिए सबसे पहले रफ़ी को गाने का मौका तब मिला जब ‘बैजू बावरा’ की रिकॉर्डिंग के दौरान तलत महमूद सिगरेट पीने चले गए थे तब नौशाद बेहत नाराज हुए फिल्म के गाने रफ़ी से गवाने का फैसला किया. 1952 में बैजू बावरा के गीत गाने के बाद रफ़ी के गले से खून तक निकला पर रफ़ी की मेहनत रंग लायी और उनके गाने बेहत पसंद किये जाने लगे.

रफ़ी ने शास्त्रीय संगीत को आसान बना दिया. फिल्मों में रफ़ी ने किशोर कुमार तक के लिए रफ़ी ने गाने गए और वो भी खुद किशोर कुमार के आग्रह करने के बाद. रफ़ी साहब के गाने ने कइयों को एक्टर से स्टार बनाने में योगदान दिया वो चाहे देवानंद  हों या दिलीप कुमार, राजेंद्र कुमार हों या ऋषि कपूर, अमिताभ हों या फिर जॉनी वॉकर।

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रफ़ी ने बंटवारे के बाद भी अपने गीतों से हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच में कभी फासला नहीं आने दिया. रफ़ी की पत्नी ने जब उनसे पाकिस्तान चलने को कहा तो उन्होंने पत्नी को छोड़ दिया पर हिंदुस्तान नहीं छोड़ा. उन्होंने बाद में दूसरी शादी की बिलगिस बानो से. बिलगिस और रफ़ी के सात बच्चे हुए और यही उनकी दुनिया थी. उनका नाम कभी किसी के साथ अफेयर में नहीं आया.

रफ़ी साहब 55 साल की अपनी ज़िंदगी में 40 सालो तक संगीत की दुनिया में ही रहे और उन्होंने 25 हजार से भी अधिक गीत गाये. 31 जुलाई 1980 का दिन, जिस दिन वो दुनिया को अलविदा कह गए, उस दिन भी वह रिकॉर्डिंग के लिए आये और संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के लिए गाना भी गाया ‘तू कभी आस-पास है दोस्त’. स्टूडियो से हमेशा साथ निकलते थे पर उस दिन कहा ‘तो अब मैं चलूं’. यही उनके अंतिम लफ्ज़ थे. सभी को ये अटपटा-सा लगा क्योंकि रफ़ी साहब कभी ऐसा कहते नहीं थे. पर उसके बाद एक-के-बाद एक उन्हें तीन बार दिल का दौरा पड़ा और धड़कन रुक गयी. जिस दिन रफ़ी साहब ने दुनिया को अलविदा कहा वह रमजान के महीने की जुमे की एक रात थी. 

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