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किताबों को अच्छा या बुरा कहने का पैमाना कैसा हो?

मेरा मानना रहा है कि पत्रकारों को किताबें नहीं लिखनी चाहिए. कम से ऐसी किताबें तो बिल्कुल नहीं जो वैचारिक हों. यह बात नौकरशाहों, राजनयिकों और यूनिवर्सिटी के मार्फत सरकार के लिए काम करने वालों पर भी लागू होती है. हालांकि, हाल में मैंने अपनी यह सोच बदल दी.

ऐसा नहीं है कि मैं जर्नलिस्टों को वैचारिक लेखन के लायक नहीं मानता. मेरे हिसाब से वो वैचारिक लेखन को खूबसूरत ढंग से नहीं लिख पाते. वे अक्सर निगेटिव बातों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं.

नौकरशाहों, राजनयिकों और दूसरे मौजूदा या पूर्व सरकारी कर्मचारियों में एक किस्म का अहंकार और चीजों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की आदत होती है. हालांकि, कभी-कभार उनमें से कोई इन जंजीरों से आजाद भी हो जाता है.

मेरे एक करीबी रिश्तेदार ने हाल ही में एक किताब लिखी है. जब हम दोनों अपनी-अपनी किताबों को मिले रिस्पॉन्स पर नोट्स की तुलना कर रहे थे तो उन्होंने कहा-जो एकेडमिक्स खुद को एक्सपर्ट मानते हैं, वे लिख नहीं सकते और जिन्हें लिखना आता है, वे एक्सपर्ट नहीं हैं.

हालांकि, कभी-कभी ऐसा अकादमिक भी दिख जाता है, जो दोनों काम बखूबी कर सकता है. उनके लेखन को अकादमिक दुनिया के लोग शोमैनशिप बताते हैं जबकि दूसरे एक्सपर्ट्स जर्नलिज्म जैसी राइटिंग करार देते हैं. अक्सर ऐसी राइटिंग के बारे में गोलमोल राय दी जाती है.

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Source - टीसीए श्रीनिवास राघवन, द क्विंट

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