सड़क पर घायलों के साथ थोड़ा सा मर जाता है भारत

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दिल्ली में हाल ही में एक घटना हुई। सड़क दुर्घटना। एक राहगीर को खाली पड़ी सड़क पर एक टैंपो ने कुचल दिया। वह व्यक्ति सड़क किनारे जा गिरा। टैंपो वाला रुका, देखा और चलता बना। उसके बाद एक के बाद दसियों लोग वहां से गुज़रे और गुज़रते गए। एक रिक्शे वाला आया और घायल का मोबाइल फोन उठाकर चलता बना। बहुत देर बाद कुछ पुलिस वालों ने घायल को अस्पताल पहुंचाया लेकिन तब तक वह दम तोड़ चुका था। यह पूरी घटना एक सीसीटीवी में दर्ज है। इस घटना ने एक बार फिर दिल्ली को शर्मसार कर दिया है और यह साबित किया है कि दिल्ली दिलवालों की नहीं बल्कि मतलबपरस्त और बेदिल भीड़ का शहर है। कनाडा में रह रहे भारतीय मूल के राजनेता उज्जल दोसांझ का कहना है कि उन्हें इस घटना ने झकझोर दिया है और कि इस तरह की घटनाओं से उनके और भारत का एक हिस्सा रोजाना दम तोड़ देता है।

इसमें उज्जल ने लिखा है: मुझे अपने भारतीय होने पर गर्व है। लेकिन जब आज मैंने यह समाचार पढ़ा तो भीतर जैसे कुछ दरक गया। ऐसा लगा कि गहरे भीतर जहां भावनाओं का समंदर ठाठें मारता है, मेरा वह कुछ हिस्सा मर गया। मैं रोता हूं। मेरी अंदरुनी चिल्लाहट, एक लंबी चुप्पी में बदल जाती है। मुझे पता है कि मैं कितनी भी जोर से रोउं, मेरा रोना यहां से 15000 मील दूर मेरी धरती मां, भारत माता को नहीं सुनेगा। तुम्हें मेरी आंखों के आंसू नहीं दिखेंगे और न ही वह गुस्सा महसूस होगा। इसलिए जब मेरे आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे, नाक बह रही थी और जबान कुछ कहना चाह रही थी, मैंने दूसरा रास्ता चुना और अपनी कंपकपाती अंगुलियों से लिखना शुरू किया। यह पत्र जो मैं आपको, मेरे प्यारे भारत के सभी पुरुषों, महिलाओं व बच्चों को भेजना चाहता हूँ।

अपने इस पत्र में उज्जल ने भ्रष्टाचार, महिलाओं व दलितों पर अत्याचार सहित भारत की विभिन्न समस्याओं का जिक्र किया है। उन्होंने लिखा है: जिंदगी भर, मैं हमेशा ही भारत के बारे में सोचता रहा हूं। अब तो मैं कभी कभी इस बारे में लिखने भी लगा हूं। दुर्भाग्य से हम सभी जानते हैं कि भारत में इतने मुद्दे व चुनौतियों हैं कि अगर आप में से कुछ सुन्न जैसे भी हो गये हों तो मैं समझ सकता हूं। इसमें नया क्या है? आप की तरह मैं भी जानता हूं कि अन्याय, भ्रष्टाचार व हिंसा की सूची बहुत लंबी है… दलितों, गरीबों व निशक्तों पर हर दिन होने वाले जातिगत अत्याचार हैं। धार्मिक कट्टरता से उपजी हिंसा है। कथित पैसे वालों, बाहुबलियों, पुलिस वालों, राजनेताओं व नौकरशाहों की जैसे एक अलग दुनिया है।

उन्होंने कहा कि वे भारत में दलितों के खिलाफ सदियों से हो रहे हिंसा के बारे में सोचते हैं। मुसलमानों के खिलाफ हिंसा थमी ही नहीं थी कि दलितों पर हमले की घटनाएं सामने आईं। उससे पहले तर्कवादियों व स्कालरों की हत्याएँ हो रही थीं। महिलाओं से बलात्कार तथा बच्चों से अत्याचार थम नहीं रहे हैं।  दोसांज ने इन सभी को भारतीय समाज के समक्ष मौजूद चुनौतियों, मुद्दों व समस्याओं के रूप में रेखांकित किया है।

अपने निष्कर्ष में उन्होंने उम्मीद जताई है कि जो घटित हो रहा उसकी अमानवीयता पर गुस्सा हमें बदलाव लाने का साहस व शक्ति देगा।

उज्जल दोसांझ का पूरा आलेख यहाँ पढ़ें।

 

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Source - उज्जल दोसांझ, इंडियन एक्सप्रेस