यूरो और यूरोपीय संघ को बचाने के लिए सात ज़रूरी बदलाव

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जब से ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ से अलग होने के पक्ष में मतदान किया है, यूरो व यूरोपीय संघ के भविष्य को लेकर बहस शुरू हो गई है। अमरीकी अर्थशास्त्री व नोबल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर जोसेफ श्टीगलिट ने यूरो व यूरोपीय संघ के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए सात जरूरी बदलावों की वकालत की है।

जोसेफ ने गार्डियन अखबार में अपने एक आलेख में कहा है कि अब समय आ गया है कि यूरोपीय संघ में सुधार हों या ‘तलाक’ हो? उन्होंने कहा कि अगर यूरोपीय संघ सात महत्वपूर्ण बदलाव नहीं करता है तो उसके सदस्य अपरिहार्य रूप से यही सोचेंगे कि वे एक ऐसे विवाह बंधन में बंध गए हैं जो वे करना नहीं चाहते थे।
आलेख में उन्होंने लिखा है कि यूरोजोन 2008 के संकट के बाद से अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहा है यह कहना हालात को कमतर आंकना होगा। इसके सदस्य देशों का प्रदर्शन यूरोजोन के बाहर के यूरोपीय संघ देशों के प्रदर्शन से बहुत खराब रहा है, अमरीका की तुलना में तो और भी खराब जो कि इस सारे संकट का केंद्रबिंदु रहा।

जोसेफ ने लिखा है कि सबसे खराब या बदतर प्रदर्शन करने वाले देश या तो मंदी में चले गए या महामंदी में; उनके हालात -यूनान की सोचें – कई मायनों में 1930 की महामंदी की तुलना में अधिक खराब हो गए। सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले यूरोजोन सदस्य, जैसे कि जर्मनी.. अच्छा दिखे लेकिन केवल तुलनात्मक रूप से और उनकी वृद्धि का माडल आशिंक रूप से उन नीतियों पर निर्भर रहा है जिनके तहत ‘अपने आर्थिक फ़ायदे के लिए अपने सहयोगी देशों के हितों की परवाह नहीं की जाती।’

जोसेफ ने जो सात उपाय या कदम सुझाए हैं उनमें उस अभिसरण या कन्वर्जेंस दायरे को छोड़ना जिसमें घाटे को जीडीपी के 3 प्रतिशत से कम रखने की अनिवार्यता है। इसी तरह मितव्ययता की जगह वृद्धि की रणनीति अपनाना। संकट की आशंका वाली उस प्रणाली को समाप्त करना जिसमें देशों को उस मुद्रा में उधारी लेनी होती है जो कि उनके नियंत्रण में नहीं होती।

पूरा आलेख यहाँ पढ़ें।

 

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Source - जोसेफ़ श्टीगलिट, गार्डियन