अकेला रहने का सुख

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हाल ही में एक अध्ययन आया जिसमें दावा किया गया है कि अकेले लोग अधिक खुश रहते हैं। यानी शादीशुदा लोगों की तुलना में अविवाहित लोग अधिक सामाजिक होते हैं, अधिक लोगों से जुड़े रहते हैं और जीवन का आनंद उठाते हैं।

दरअसल हाल ही में सामने आये एक सर्वेक्षण में यह दावा किया गया था। अदाकारा, कामेडियन व लेखिका सैरा बेनिन्कासा ने इस अध्ययन पर टिप्पणी करते हुए व्यक्तिगत आधार पर इसके निष्कर्ष का समर्थन किया है। सारा का यह आलेख गार्डियन ने प्रकाशित किया है।

पहले अध्ययन की बात:  अमेरिका में मनौज्ञानिकों के संगठन अमेरिकन साइकॉलाजिकल एसोसिएशन के 124वें सालाना सम्मेलन में बेला दि पाउलो ने कहा कि अकेले या अविवाहित लोग अधिक सामाजिक जीवन जीते हैं और शायद उनका मनोवैज्ञानिक विकास कई विवाहित लोगों से बेहतर होता है। बेला ने 814 अध्ययनों का हवाला दिया और यह आंकड़ा निकाला जाता दर्शाता है कि अविवाहित लोग अपने परिवार व लोगों से अधिक जुड़े होते हैं। वहीं ऐसा लगता है कि शादी का बंधन दो लोगों को अपनी ही दुनिया में सीमित, संकीर्ण या अकेला कर देता है।

इस अध्ययन का निष्कर्ष है कि जब सिंगल लोगों की बात आती है जिन्होंने शादी नहीं की तो पाया गया है कि वे अच्छा सामाजिक जीवन जीते हैं अधिक अनुभवी होते हैं व आत्मनिर्णय करने वाले होते हैं। ऐसे लोग अपने में खुश रहते हैं। इसके अनुसार जब लोग अविवाहित से विवाहित हो जाते है तो थोड़े दिन तक खुश रहते हैं। कई अध्ययनों के अनुसार शादी के बाद, अपने करीबी लोगों के साथ अपने संबंधों को खो देते हैं। सिंगल लोग सामाजिक संबंधों को बनाए रखने में समक्ष होते हैं।

सैरा बेनिन्कासा  के तर्क:  सैरा कहती हैं कि वे 35 साल की हैं और बीस साल में पहली बार अपनी इच्छा से अकेली रह रही हैं। इसका मतलब है कि 1996 से 2016 के दौरान वे हमेशा किसी न किसी तरह की रिश्तेदारी नातेदारी में रही हैं। इस दौरान वे स्कूल गईं, कालेज किया, स्नातकोत्तर किया, अनेक काम किए और किताबें छपवाईं आदि आदि। लेकिन इस दौरान भी, अपने काम से बहुत प्यार करने के बावजूद उनके अंतर्मन में कहीं न कहीं यह भावना रही कि पूर्ण होने या जीवन में सार्थकता लाने के लिए एक साथी होना चाहिए। यानी यह हमेशा उनकी सोच रही कि अकेला होना कोई अच्छी बात नहीं है।

लेकिन अब वे मानती हैं कि किसी दूसरे पर निर्भर रहकर कोई खुश नहीं रह सकता। चाहे यह निर्भरता भावनात्मक हो या वित्तीय या किसी और वजह से।

वे कहती हैं कि जबसे वे इन सबसे यानी अकेले नहीं रहने की सोच से उपर उठी हैं तो उनका जीवन ही जैसे बदल गया है। वे परिवार व दोस्तों को अधिक समय दे पा रही हैं। इसके साथ ही वे बेला डि पाउलो की इस राय से सहमति रखती हैं कि,’अच्छे जीवन के लिए कोई एक ख़ाका नहीं है। हमें यह परवाह नहीं करनी चाहिए कि दूसरा क्या कर रहा है या क्या सोचेगा।’

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Source - सैरा बैनिन्कासा, गार्डियन