कुछ याद भी रहेगा गूगल के सिवा?

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इंटरनेट पर बढ़ती निर्भरता से एक नयी बहस खड़ी हो गई है। इंटरनेट की लगातार उपलब्धता तथा इसके इस्तेमाल से मानव मात्र की यादाश्त या स्मरण शक्ति किस तरह से प्रभावित हो रही है। उसका व्यवहार किस तरह से बदल रहा है, इस पर बहस हो रही है।

स्टीवन पूल ने गार्डियन में एक रपट में इस मुद्दे को उठाया है। इसके अनुसार यह सोच है कि जब हम स्मार्टफोन व नोटबुक का इस्तेमाल कर रहे होते हैं तो वे एक तरह से हमारे दिमाग का हिस्सा बन जाती हैं। इस लिहाज से हम पहले ही साइबोर्ग बन गए हैं। साइबोर्ग यानी आधे मानव आधे मशीन।

इस रपट में दरअसल यह पड़ताल करने की कोशिश की गई है कि इंटरनेट के इस्तेमाल का हमारी स्मरण शक्ति या दिमाग पर क्या असर होता है और यह हमारी सोच, व्यवहार को किस तरह बदलता है।

इसमें उन्होंने सवाल उठाया है कि अब किसी को भी कुछ जानकारी है? क्या कोई भी कुछ भी जानता है? दरअसल जब कहीं भी, किसी भी समय स्मार्टफोन की उपलब्धता आधुनिक समय का एक अजूबा ही माना जाएगा। लेकिन क्या हम उस पर कुछ ज्यादा ही निर्भर नहीं हो रहे हैं? गाने सुनने से लेकर, समय देखने, मैप देखने, शब्दार्थ ढूंढने, संदर्भ तलाशने… हर जगह मोबाइल होता है इंटरनेट होता या वाइफाई होता है।

एक नये अध्ययन का जिक्र इस परट में है जिससे यह संकेत मिलता है इस तरह की निर्भरता का आने वाले दिनों में व्यापक असर हो सकता है। सूचनाओं, जानकारी के लिए हम आज गूगल का जितना इस्तेमाल कर रहे हैं, आने वाले दिनों में हमें उसकी इससे भी ज्यादा जरूरत होगी।

दअसल इस अध्ययन का सार यह है कि अगर आपको गूगल के इस्तेमाल की आदत एक बार पड़ जाए तो आप अगली बार उसका और ज्यादा इस्तेमाल करेंगे। कई बार तो ऐसे काम के लिए भी, जो आप आसानी से याद रख सकते हैं या बिना गूगल के भी कर सकते हैं। लेकिन यह हमारी आदत बन जाती है तो हम अपनी स्मरण शक्ति या व्यक्तिगत कौशल का इस्तेमाल बंद करते देते हैं।

सामान्य स्मरण शक्ति पर मनोवैज्ञानी बेंजामिन स्टोर्म, सीन टोन व आरोन बेंजामिन की एक रपट के निष्कर्ष में कहा गया है कि,’किसी सूचना के लिए इंटरनेट पर निर्भर होने वाला व्यक्ति दूसरी सूचनाओं के लिए भी इंटरनेट पर निर्भर हो जाएगा इसकी पूरी संभावना है।’  यानी धीरे-धीरे होगा यह कि हमें गूगल या दूसरे शब्दों में कहें तो इंटरनेट ही याद रहेगा बाकी कुछ नहीं।

इंटरनेट के स्मरण शक्ति पर प्रभाव संबंधी पूरा आलेख यहाँ पढ़ें।

 

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Source - स्टीवन पूल, गार्डियन