ब्रिटेन की ट्रेनों की हालत तो भारत से भी बदतर!

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भारत में रेलगाड़ियों की स्थिति को लेकर प्राय: चर्चा होती है। डिब्बों में भीड़, स्टेशनों पर गंदगी, ट्रेनों की लेटलतीफी… और भी बहुत कुछ। लेकिन भारत में रेलगाड़ी की शुरुआत करने वाले ब्रिटेन में ट्रेनों की हालत भी कोई अच्छी नहीं है। भारतीय मूल के कमेडियन, अभिनेता व रेडियो प्रस्तोता निश ‘निशांत’ कुमार का तो मानना है कि भारत की तुलना में ब्रिटेन में रेलगाड़ियों की हालत बदतर है।

निश कुमार ने गार्डियन में लिखे एक लेख में यह राय दी है। इसमें उन्होंने ब्रिटेन के दक्षिण रेल कर्मचारियों की हड़ताल का जिक्र करते हुए कहा है कि इन गर्मियों में ‘सदर्न’ में लगातार विभिन्न दिक्कतों ने ब्रिटेन में रेल सेवाओं के फिर से राष्ट्रीकरण के विचार को बल मिला है। निश कुमार के अनुसार रेल सेवाओं के फिर से राष्ट्रीयकरण की इस बहस में उनकी खासी रुचि है। उन्होंने लिखा है,’ मैं एक स्टेंडअप कमेडियन हूं जो ड्राइव नहीं कर सकता। मैंने कभी सीखा ही नहीं। दरअसल मुझे अपनी आंखों और हाथों के तालमेल पर भरोसा नहीं रहा है। जैसे कि आप उस व्यक्ति के बारे में सोचें जिसने कैचिंग अभ्यास के दौरान अपने ही सिर पर गेंद मरवा ली; ऐस में मुझे नहीं लगता कि मुझे तेज गति से चलने वाले धातु से बने मौत के रोबोट पर हाथ आजमाने चाहिएं।’

निश कुमार का कहना है कि वह यात्रा के लिए देश की रेल सेवाओं पर ही निर्भर करते हैं। उन्होंने लिखा है,’और मैं अपने अनुभव के आधार पर आपको कह सकता हूं कि हमारी रेल सेवा प्रणाली एक झंझट है। गाड़ियां यात्रियों से खचाखच भरी होती हैं और हम शायद डिब्बों में कैद होने का ही भारी भरकम शुल्क चुकाते हैं। सीट मिलना तो दूर, खड़े रहने को ही जगह मिल जाए तो खुशनसीबी’।

अपने आलेख में उन्होंने बताया है कि ब्रिटेन में रेल किराया किस तरह अन्य यूरोपीय देशों की तुलना में महंगा है। ट्रेन की कन्फर्म टिकट पाना बहुत बड़ा महाभारत है। यही कारण है कि प्राय: यात्रा करने वाले लोग महीनों भर पहले से ही तैयारियों में लगे रहते हैं। होता यह है कि कई बार तो टिकट होने के बावजूद लोगों को शौचालयों के पास खड़े होकर यात्रा करनी पड़ती है।

उन्होंने कहा कि बचपन, किशोरवस्था में वे अपनी दादी से मिलने समय समय पर भारत जाते थे। तब उनके सहपाठी उनसे आमतौर पर वहां ट्रेनों की हालत के बारे में पूछते थे क्योंकि उनके मन में वे तस्वीरें थी जिनमें यात्री रेलगाड़ी की छतों पर बैठ दिखते हैं। उन्होंने लिखा है,’मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि ब्रिटेन में अब ट्रेनों की हालत भारतीय रेलगाड़ियों से भी बुरी है। भाई, अगर आप छत पर भी बैठे हों तो आपके पास कम से कम सीट तो है बैठने के लिए।’

निश कुमार का पूरा लेख यहाँ पढ़ें।

 

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Source - निश कुमार, गार्डियन