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दरगाह में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति अच्छा कदम

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बंबई उच्च न्यायालय ने हाल ही में हाजी अली दरगहा में मुस्लिम महिलाओं के प्रवेश के अधिकार को उचित ठहराया और उन्हें प्रवेश की अनुमति दी। पाकिस्तान की लेखक अनम जकारिया ने इसे अच्छी पहल करार देते हुए कहा है कि भारत व पाकिस्तान में मस्जिदों, मंदिरों यानी पूजा स्थलों को महिलाओं के अनुकूल बनाने के लिए बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है।

जकारिया ने कुछ साल पहले अपनी मुंबई यात्रा का जिक्र किया है। उन्होंने कहा कि वे अकेली यात्रा कर रहीं थीं और उन्हें बताया गया था कि अगर वे हाजी अली की दरगाह नहीं गईं तो  उनकी यात्रा अधूरी रहेगी। उन्होंने लिखा है- मैं अपने साथ एक दुपट्टा विशेष रूप से लेकर गई थी क्योंकि मुझे पता था कि महिला के रूप में मुझे कुछ ऐसे नैतिक नियमों का पालन करना होगा जिनसे पुरुषों को प्राय: छूट मिल जाती है। मुझे यह भी पता था कि मुझे दरगाह में ज्यादा अंदर तक नहीं जाने दिया जाएगा।

उन्होंने लिखा है – मैं पंजाब व पाकिस्तान में अनेक दरगाहों में गई हूं और हमेशा ही इस भावना के साथ लौटी हूं जैसे प्रदूषण फैलाने वाली हूं। ऐसी शख्सियत जिसके पास किसी पवित्र स्थल को अपवित्र या दूषित करने की ताकत हो। इन स्थानों से शांति मिलने के बजाय कई बार तो मैं गुस्से व क्षोभ के साथ लौटी हूं। एक ऐसे देश में जहां महिलाओं के क्षेत्र को लेकर लगातार लड़ाई चल रही हो, यह बताया जाना कि मैं पूजा स्थलों के अधिक ‘पवित्र’ क्षेत्रों में प्रवेश नहीं कर सकती शुद्धता और अशुद्धता, नैतिकता और अनैतिकता तथा बेशर्मी और सम्मान की एकतरफा व मनमानीपूर्ण सीमाएं तय करता है।

आलेख में उन्होंने लिखा है कि महिलाओं की सुरक्षा आदि के लिहाज से  पाकिस्तान दुनिया में दूसरा सबसे खराब देश आंका गया है। यानी यहां महिलाओं के लिए हालात बदतर हैं। पाकिस्तान में ज़्यादातर महिलाओं का सामाजिक दर्जा दयनीय स्तर तक नीचा है और सार्वजनिक क्षेत्रों में उनकी आवाज कहीं सुनाई नहीं देती।

उन्होंने लिखा है कि ज्यादातर सरकारी नीतियां व कार्रवाइयां महिला अधिकारों की दिशा में काम करने की बजाय हालात को और बदतर बनाती हैं। हिंसा के खिलाफ महिलाओं की रक्षा संबंधी विधेयक को लेकर हाल ही में जोरदार बहस हुई। देश के रूप में हम अब भी इस बात पर बहस कर रहे हैं कि पतियों को अपनी पत्नियों को हल्के हल्के पीटने की अनुमति होनी चाहिए या महिलाओं को इस तरह के उत्पीड़न से किसी राहत की जरूरत है।

अनम जकारिया का पूरा आलेख यहाँ पढ़ें।

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Source - अनम ज़कारिया, द वायर

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6 September 2016