अमेरिका के शिक्षा जगत पर भारी पड़ेगा ट्रंप का ‘मुस्लिम प्रतिबंध’

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अमरीका में राष्ट्रपति पद के लिए रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप चाहते हैं कि देश में मुसलमानों के प्रवेश पर रोक लगे। वे इस चुनाव की दौड़ में शामिल होने के समय से ही यह कहते रहे हैं। यह अलग बात है कि मुसलमानों के अमरीका के प्रवेश पर प्रतिबंध का उनके प्रस्ताव ने बीते महीनों में कई रूप लिए हैं।

वाशिंगटन पोस्ट ने अपने एक संपादकीय में कहा है कि भले ही डोनाल्ड ट्रंप ने बीते कुछ माह में प्रचार अभियान के दौरान मुसलमानों पर प्रवेश पर प्रतिबंध संबंधी अपने प्रस्ताव में कई बदलाव किए हों लेकिन वे सभी घिनौने हैं। इन प्रस्तावों को किसी भी रूप में लिया जाए इनका बहुत प्रतिकूल असर होगा जिनकी अब तक अनदेखी की गई है। यह नुकसान वह है जो अमरीका में विशवविद्यालयों व महाविद्यालयों पर इसके असर से होगा।

इस रपट के अनुसार रिपब्लिकन पार्टी में जब स्वीकारोक्ति भाषण दे रहे थे तो उन्होंने ‘अमरीका में मुसलमानों के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध के अपने मूल आह्वान’ में संशोधन किया। इसके बजाय उन्होंने ‘आतंकवाद से समझौता करने वाले किसी भी देश से आव्रजन को निलंबित’ करने का प्रस्ताव किया। यहां अगर आतंकवाद से समझौते को परिभाषित किया जाए तो वह देश जिसके यहाँँ हाल ही में कम से एक आतंकवादी हमला हुआ वे इस श्रेणी का देश बन जाता है। तो ट्रंप की अवांछित नागरिकों की सूची में फ्रांस के नागरिक, बेल्जियम के नागरिक और यहां तक कि अमेरिका के नागरिक भी आते हैं।

इसके अनुसार अगर ट्रंप की मंशा उन देशों से है जिन्हें विदेश मंत्रालय ने उन देशों के रूप में चिन्हित किया है जहां कोई न कोई आतंकवादी संगठन उपस्थित है, काम कर रहा है तो भी सउदी अरब जैसे सहयोगी या मित्र देशों का क्या होगा? इसके बाद ट्रंप ने अपने प्रस्ताव को और संशोधित करते हुए उन देशों से आव्रजन बंद करने का प्रस्ताव किया जो ‘दुनिया के कुछ सबसे ख़तरनाक व उठापटक वाले क्षेत्रों में से हैं और जिनका आतंकवाद के ‘निर्यात’का इतिहास रहा है।’

इसके अनुसार सऊदी अरब ने 2015 में लगभग 60,000 विद्यार्थी अमरीका में अध्ययन के लिए भेजे। विदेश मंत्रालय की राडार पर आए भारत ने भी 1,33,000 विद्यार्थी वहां भेजे। ईरान व तुर्की में से प्रत्येक ने इस दौरान 10,000 से अधिक तो मलेशिया ने 7000 विद्यार्थी अमरीका भेजे।

इनमें से ज्यादातर विद्यार्थियों को चूंकि अपने अध्ययन के लिए पैसा अमरीका से बाहर से मिलता है इसलिए वे सम्बद्ध विद्यालयों के वित्तीय स्रोत के रूप में महत्वपूर्ण होते हैं। इस तरह से वे एक तरह से अमरीका की अर्थव्यवस्था में योगदान करते हैं। सउदी अरब के छात्र ही हर साल अमरीकी अर्थव्यवस्था में 1.7 अरब डालर का योगदान करते हैं। भारतीय विद्यार्थियों का योगदान 3.6 अरब डालर का है।

रपट में सवाल उठाया गया है कि अगर डोनाल्ड ट्रंप के प्रस्ताव पर अमल हुआ और उक्त देशों से विद्यार्थियों का आना प्रतिबंधित हो गया तो इससे अमरीका में विभिन्न महाविद्यालयों, विशवविद्यालयों की वित्तीय स्थिति और कुल मिलाकर अमरीकी अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा।

पूरी रपट यहाँ पढ़ें।

 

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Source - वाशिंगटन पोस्ट