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पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों की हिफाजत कौन करेगा?

BY Nalin | PUBLISHED: 9 September 2016

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पाकिस्तान तमाम तरह की समस्याओं से घिरा हुआ है जिनमें आतंकवाद सर्वोपरि है. ऐसे माहौल में मुल्क के अल्पसंख्यकों की सुध किसी को नहीं है. मौजूदा शासन हो या पिछली सरकारें, अल्पसंख्यों के कानून और संविधान प्रदत्त अधिकारों की गारंटी सुनिश्चत करना मानो उनके दायित्वों में शुमार नहीं रहा हो.

यह विचार पाकिस्तानी अखबार एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने प्रकाशित किया है. अखबार में एक विस्तृत लेख में लाल चंद मल्ही ने जिक्र किया है कि पाकिस्तान की स्थापना के दिनों से ही अल्पसंख्यकों ने देश के विकास में अहम भूमिका अदा की है, लेकिन कभी भी उनके साथ अपनों जैसा सलूक नहीं किया गया. उन्हें कदम-कदम पर बहुसंख्य आबादी के मुकाबले कमतरी का अहसास कराया जाता रहा है. हालांकि स्वयं कायदे आजम जिन्ना ने एकाधिक अवसरों पर अल्पसंख्यकों के साथ किसी भी तरह का भेदभाव नहीं होने देने का वायदा किया था.

जिन्ना ने 13 जुलाई 1947 को कहा था: “अल्पसंख्य चाहे किसी भी समुदाय के हों, उनकी रक्षा की जाएगी. उनके धर्म, संप्रदाय या मत को हर तरह से संरक्षण मिलेगा. उनकी जिंदगी और संपत्ति सुरक्षित होगी. उपासना की उनकी आज़ादी में कोई दखलअंदाज़ी नहीं होगी.”

पाकिस्तान के अल्पसंख्य कोई चाँद नहीं मांग रहे हैं. उनकी अपेक्षा मात्र ये है कि क़ायदे आज़म के शब्दों को व्यवहार में लाया जाए और संविधान के अनुच्छेद 21-22, अनुच्छेद 25-28 और अनुच्छेद 36 में अल्पसंख्यकों दी गई गारंटी को लागू किया जाए.

लाल चंद मल्ही को शिकायत है कि जिन्ना के वायदे या संविधान के प्रावधानों को व्यवहार में लाना तो दूर, प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने अपने चुनावी घोषणा-पत्र में अल्पसंख्यकों के लिए उल्लिखित कार्यक्रमों को लागू करने तक का इरादा नहीं दिखाया है. सुप्रीम कोर्ट का 2014 का एक दूरगामी फैसला भी धूल फांक रहा है जिसमें सरकार को धार्मिक सहिष्णुता बढ़ाने और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की गारंटी सुनिश्चित करने के लिए कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए गए थे. इनमें अल्पसंख्यकों के उपासना स्थलों की सुरक्षा के लिए एक विशेष पुलिस बल के गठन का निर्देश भी शामिल था.

लेखक ने देश के विभिन्न हिस्सों खासकर सिंध में जबरन धर्म परिवर्तन कराए जाने के गंभीर मुद्दे को भी उठाया है और इसे हिंदुओं के पलायन के पीछे मुख्य कारण बताया है.

एक्सप्रेस ट्रिब्यून के आलेख को संपूर्णता में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

 

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Source - लाल चंद मल्ही, एक्सप्रेस ट्रिब्यून

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9 September 2016