ख़ुशी के पीछे न भागें! हम बने ही हैं असंतुष्ट रहने के लिए!

4992 प्रसन्नता या खुशी क्या है, किसे कहते हैं, इसका पैमाना क्या है और किसी के लिए सबसे बड़ी खुशी क्या? इन सब सवालों पर सालों साल से बहस चल रही है, अनुसंधान हो रहा है। अनेक शोध प्रकाशित हो चुके हैं और किताबें आ चुकी हैं। लेकिन ऐसा कोई जवाब शायद ही सामने आया हो जो हमें पूरी तरह से संतुष्ट कर सके। अगर दूसरे शब्दों में कहें तो हम संतुष्ट हो भी नहीं सकते क्योंकि एक नया और रोचक अनुसंधान कहता है,’प्रसन्न होने की कोशिश मत करिए क्योंकि हमारी बनावट ही असंतुष्ट रहने के लिए हुई है।’

फ्रेंक मैक्एंड्रयू ने गार्डियन में छपे अपने एक लेख में इस मुद्दे की पड़ताल करने की कोशिश की है। उन्होंने लिखा है कि 1990 में मनोवैज्ञानिक मार्टिन सेलिगमैन ने ‘सकारात्मक मनोविज्ञान आंदोलन’ शुरू किया। इससे हुआ यह कि मानवीय खुशी या प्रसन्नता, मनोविज्ञान अनुसंधान व सिद्धांतों के केंद्र में आ गई। इसने उस रुख को जारी रखा जो मानवतवादी व अस्तित्व के मनोविज्ञान के साथ 1960 में शुरू हुआ और जो किसी व्यक्ति विशेष की अंतर्जात संभावनाओं को हासिल करने तथा जीवन का अर्थ सृजित करने पर जोर देता है।

इस आलेख के अनुसार उसके बाद हजारों अध्ययन और सैकड़ों किताबें प्रकाशित हुईं जिनका उद्देश्य सुख :वेलबीइंग: को बढ़ावा तथा लोगों को अधिक संतुष्ट जीवन जीने में मदद करना है।

तो इतने साल हो गए हम हम खुश, हर्षित या आनंद से भरे क्यों नहीं हैं? खुशी को मापने के सारे पैमाने 40 साल से जड़ क्यों हैं?

अध्ययन के अनुसार, दरअसल एक तरह से खुशी को बढाने या आनंद को अधिकतम करने के अब तक के सारे प्रयास एक तरह से लहरों के विपरीत तैरने के विफल प्रयास साबित हुए हैं क्योंकि वास्तव में हम बनावट ही ज्यादातर समय असंतुष्ट रहने की है। हम इसी तरह प्रोग्राम किए गए हैं।

समस्या का एक तत्व यह भी है कि खुशी कोई एक चीज नहीं है।

इस रपट में जेनिफर हेच की किताब ‘द हैप्पीनेस मिथ’ का जिक्र किया गया है। दार्शनिक जेनिफर ने खुशी का इतिहास पढ़ा है। हेच का कहना है कि हम सभी अलग अलग तरह की खुशी महसूस करते हैं लेकिन जरूरी नहीं है कि वे एक दूसरी की पूरक हों। दूसरे शब्दों में कहें किसी एक खुशी को या एक चीज पर खुशी को ज्यादा मनाने या ज्यादा खुश होने पर हो सकता है कि हम दूसरी खुशियों की, उनकी संभावनाओं की अनदेखी कर रहे हों। तो एक तरह से हमारे लिए यह संभव ही नहीं है कि हम एक साथ सभी तरह की खुशियां झोली भर कर हासिल कर लें।

उनके अनुसार यह विडंबना है कि जीवन के एक हिस्से में जब खुशी बढ़ती है तो दूसरे हिस्से में वह घट जाती है। यह प्राय: होता है।

खुशी के इतिहास पर पूरी रपट यहाँ पढ़ें

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Source - फ्रैंक मकएंड्र्यू, गार्डियन