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हमारी निजी जानकारी से कमाई कर रही हैं कंपनियाँ

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इंटरनेट और स्टार्टअप के इस युग में उपभोक्ताओं से जुड़ी जानकारी बहुत महत्वपूर्ण हो गई है। सोशल मीडिया वेबसाइटों ही नहीं अन्य पोर्टलों के लिए भी यह जानकारी बहुत मायने रखती है और एक तरह से वे इसके आधार पर ही बड़ी कमाई कर रही हैं। लेकिन इसके बदले उपभोक्ताओं यानी ग्राहकों को क्या मिल रहा है? जेथन सादोवस्की ने गार्डियन में एक आलेख में इसी मुद्दे को उठाया है।

सादोवस्की ने लिखा है कि इस तरह व्यक्तिगत जानकारी या डेटा का इस्तेमाल एक तरह से शोषण का ही एक रूप है क्योंकि कंपनियां इससे भारी कमाई करती हैं लेकिन उपभोक्ताओं को कुछ भी नहीं मिलता। यानी उपभोक्ताओं या ग्राहकों को मुआवजे की कोई व्यवस्था नहीं है।

इसमें उन्होंने लिखा है कि हम जिस ‘निगरानी वाले समाज में रह रहे हैं’ उसमें यह आश्चर्यजनक और षडयंत्रपूर्ण सच्चाई है कि अज्ञात कंपनियां यानी इकाइयां हमारे आंकड़े या डेटा अज्ञात उद्देश्यों के लिए एकत्रित कर रही हैं।

कंपनियां व सरकारें हमारे जीवन से जुड़े डेटा की तह तक पहुंच रही हैं। इसके लिए उनके पास बड़े नवोन्मेषी तरीके हैं। वे यह देख रही हैं कि हम क्या करते हैं, हम किसे जानते हैं और हम कहां कहां जाते हैं। डेटा इकट्ठा करने की प्रणालियां और उद्देश्य समय के साथ विस्तारित हो रहा है, इसका कोई छोर या अंत नजर नहीं आ रहा है।

आलेख के अनुसार ये परेशान करने वाले अतिक्रमण कई तरह से हैं। कई स्तर पर हैं। उदाहरण के रूप में व्हाट्सएप आपके नाम व फोन नंबर अपनी पैतृक कंपनी फेसबुक के साथ साझा करती है ताकि कंपनियां आपको ध्यान में रखते हुए विज्ञापन फीड कर सकें। या कि वह स्टार्टअप कंपनी जो कि आपकी आनलाइन गतिविधियों को जांचने के लिए आपकी बैटरी स्टेटस का इस्तेमाल करती है। बड़े स्तर पर देखा जाए तो बाल्टीमोर की पुलिस शहर पर निगरानी रखने के लिए गोपनीय स्तर पर हवाई निगरानी प्रणाली का इस्तेमाल कर रही है। इसी तरह डेटा ब्रोकर कंपनियां हैं जो कि हमारे से प्रत्येक के बारे में व्यक्तिगत प्रोफाइल बनाते हैं और उन्हें बेचते हैं।

सादोवस्की ने विभिन्न उदाहरणों के जरिए यह बताया है कि किस तरह से कंपनियां हमारी व्यक्तिगत जानकारी या डेटा का इस्तेमाल कमाई करने के लिए करती हैं लेकिन बदले में हमें यानी ग्राहकों को कुछ नहीं नहीं देती। उन्होंने इसे एक तरह का शोषण बताया है। उनके अनुसार कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि गूगल या फेसबुक इसके बदले में हमें नि:शुल्क सेवाएं भी तो देती हैं लेकिन डेटा की मात्रा व उससे होने वाली कमाई को देखते हुए यह तर्क अपर्याप्त है।

पूरा आलेख यहाँ पढ़ें।

 

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Source - जेथन सादोवस्की, गार्डियन

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1 September 2016